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News (खबरीलाल न्यूज़) : संजय की पेड टीम ने नेताओं को दरकिनार किया, हरियाणा से यूट्यूबर बुला प्रचार; RJD की हार पर मंथन से क्या मिला:

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पटना. हार विधानसभा चुनाव में राजद को मिली करारी हार के पीछे संगठन एवं प्रत्याशियों के बीच समन्वय नहीं होना और पार्टी नेताओं का जमीनी स्तर पर सक्रिय नहीं होना रहा। पार्टी के प्रदेश से लेकर जिला, प्रखंड व पंचायत स्तर के नेताओं को दरकिनार कर एक विशेष टीम जो पेड थी, चुनाव में काम करती रही। इसकी कमान सांसद एवं तेजस्वी प्रसाद यादव के सलाहकार कहे जाने वाले संजय यादव के हाथों में थी। पार्टी की अंदरुनी समीक्षा बैठक में यह राय उभरी है। प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति बनाना इस विशेष टीम के सदस्य कर रहे थे। पदधारक होने के बावजूद उपेक्षा किए जाने पर दल के नेता और कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए तथा चुनाव में इनकी भागीदारी कहीं नहीं दिखी। नतीजा चुनाव परिणाम में दिखा और दल को इतनी शर्मनाक हार मिली।





बीते दिनों राजद नेता तेजस्वी प्रसाद यादव ने पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ घंटों बैठक की। इसके बाद पार्टी के जिला और प्रमंडल प्रभारियों को टास्क सौंपा गया कि वे हार के कारणों की रिपोर्ट दें। इन नेताओं से बातचीत में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। जिलास्तरीय नेताओं ने कहा कि करारी हार के पीछे संगठन और प्रत्याशियों के बीच तालमेल नहीं होना है। टीम संजय की पेड टीम ने जिला और प्रखंड स्तर के नेताओं को दरकिनार किया।





खुद ही सर्वे कर नेतृत्व को रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद 33 विधायकों को बेटिकट कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि बेटिकट हुए विधायक बगावत कर दूसरे दल या निर्दलीय चुनावी मैदान में उतर गए। अगर पार्टी का कोई नेता सक्रिय दिखा भी तो वह जिलों की जगह सीधे एक पोलो रोड को रिपोर्ट करता रहा, जिससे पदधारकों में निराशा का भाव रहा। पार्टी के समर्पित और पुराने लोगों को दरकिनार कर जिन्हें राजनीतिक ज्ञान नहीं था, वे दल के तारणहार के रूप में काम करते रहे।





तेज प्रताप यादव का निष्कासन और चुनावी घोषणा के पहले रोहिणी आचार्य की बगावत से यह संदेश गया कि लालू परिवार एकजुट नहीं है। पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद को बैनर-पोस्टर से गायब कर दिया गया जिससे लालूवाद के समर्थक निराश हो गए। बिहार के बदले हरियाणा, दिल्ली से यू-ट्यूबर बुलाकर प्रचार-प्रसार का आडंबर रचा गया।





माई-बहिन योजना का फॉर्म पार्टी नेताओं की ओर से भरवाया जाना था। इसकी अवहेलना कर दिल्ली और हरियाणा से आई हुई टीम के सदस्यों को दे दिया गया। इस टीम पर पैसा लेने का भी आरोप लगा। चुनाव में अव्यवहारिक घोषणाएं मसलन हर घर नौकरी के वादे किसी के गले नहीं उतरी। सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि में वृद्धि और दो सौ यूनिट फ्री बिजली को सरकार ने आंशिक तौर पर लागू कर दिया।





सबसे महत्वपूर्ण यह कि आम की कौन कहे, वरिष्ठ नेताओं, विधायकों को भी दल के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव से मिलने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। मुलाकात भी होती तो तेजस्वी अकेले नहीं होते थे। इससे पार्टी के नेता और कार्यकर्ता तेजस्वी को जमीनी स्तर की जानकारी नहीं दे सके। ऐसे-ऐसे लोगों को टिकट मिले, जिससे यह संदेश गया कि प्रत्याशियों के चयन में भी खेल हुआ है।




पटना. हार विधानसभा चुनाव में राजद को मिली करारी हार के पीछे संगठन एवं प्रत्याशियों के बीच समन्वय नहीं होना और पार्टी नेताओं का जमीनी स्तर पर सक्रिय नहीं होना रहा। पार्टी के प्रदेश से लेकर जिला, प्रखंड व पंचायत स्तर के नेताओं को दरकिनार कर एक विशेष टीम जो पेड थी, चुनाव में काम करती रही। इसकी कमान सांसद एवं तेजस्वी प्रसाद यादव के सलाहकार कहे जाने वाले संजय यादव के हाथों में थी। पार्टी की अंदरुनी समीक्षा बैठक में यह राय उभरी है। प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति बनाना इस विशेष टीम के सदस्य कर रहे थे। पदधारक होने के बावजूद उपेक्षा किए जाने पर दल के नेता और कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए तथा चुनाव में इनकी भागीदारी कहीं नहीं दिखी। नतीजा चुनाव परिणाम में दिखा और दल को इतनी शर्मनाक हार मिली।





बीते दिनों राजद नेता तेजस्वी प्रसाद यादव ने पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ घंटों बैठक की। इसके बाद पार्टी के जिला और प्रमंडल प्रभारियों को टास्क सौंपा गया कि वे हार के कारणों की रिपोर्ट दें। इन नेताओं से बातचीत में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। जिलास्तरीय नेताओं ने कहा कि करारी हार के पीछे संगठन और प्रत्याशियों के बीच तालमेल नहीं होना है। टीम संजय की पेड टीम ने जिला और प्रखंड स्तर के नेताओं को दरकिनार किया।





खुद ही सर्वे कर नेतृत्व को रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद 33 विधायकों को बेटिकट कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि बेटिकट हुए विधायक बगावत कर दूसरे दल या निर्दलीय चुनावी मैदान में उतर गए। अगर पार्टी का कोई नेता सक्रिय दिखा भी तो वह जिलों की जगह सीधे एक पोलो रोड को रिपोर्ट करता रहा, जिससे पदधारकों में निराशा का भाव रहा। पार्टी के समर्पित और पुराने लोगों को दरकिनार कर जिन्हें राजनीतिक ज्ञान नहीं था, वे दल के तारणहार के रूप में काम करते रहे।





तेज प्रताप यादव का निष्कासन और चुनावी घोषणा के पहले रोहिणी आचार्य की बगावत से यह संदेश गया कि लालू परिवार एकजुट नहीं है। पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद को बैनर-पोस्टर से गायब कर दिया गया जिससे लालूवाद के समर्थक निराश हो गए। बिहार के बदले हरियाणा, दिल्ली से यू-ट्यूबर बुलाकर प्रचार-प्रसार का आडंबर रचा गया।





माई-बहिन योजना का फॉर्म पार्टी नेताओं की ओर से भरवाया जाना था। इसकी अवहेलना कर दिल्ली और हरियाणा से आई हुई टीम के सदस्यों को दे दिया गया। इस टीम पर पैसा लेने का भी आरोप लगा। चुनाव में अव्यवहारिक घोषणाएं मसलन हर घर नौकरी के वादे किसी के गले नहीं उतरी। सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि में वृद्धि और दो सौ यूनिट फ्री बिजली को सरकार ने आंशिक तौर पर लागू कर दिया।





सबसे महत्वपूर्ण यह कि आम की कौन कहे, वरिष्ठ नेताओं, विधायकों को भी दल के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव से मिलने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। मुलाकात भी होती तो तेजस्वी अकेले नहीं होते थे। इससे पार्टी के नेता और कार्यकर्ता तेजस्वी को जमीनी स्तर की जानकारी नहीं दे सके। ऐसे-ऐसे लोगों को टिकट मिले, जिससे यह संदेश गया कि प्रत्याशियों के चयन में भी खेल हुआ है।



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