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News (खबरीलाल न्यूज़) : दो वैज्ञानिकों ने जॉब छोड़कर शुरू किया समोसा बेचना, फिर यूं खड़ी कर दी 45 करोड़ की कंपनी:

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जब कोई आपसे कहे कि दो बड़े वैज्ञानिक अपनी शानदार और लाखों की नौकरी छोड़कर समोसा बेचने जा रहे हैं, तो शायद आप भी उन्हें पागल ही कहेंगे. बेंगलुरु के रहने वाले निधि सिंह और शिखर वीर सिंह को भी लोगों ने कुछ ऐसी ही सलाह दी थी. सबने कहा था कि जमी-जमाई आलीशान जिंदगी छोड़कर समोसे के पीछे भागना बेवकूफी है. लेकिन इस कपल के सिर पर अपनी खुद की पहचान बनाने का जुनून सवार था. उन्होंने न सिर्फ अपनी नौकरी छोड़ी, बल्कि अपने सपने को पूरा करने के लिए अपना घर तक बेच दिया. आज इसी पागलपन की बदौलत उन्होंने 'समोसा सिंह' नाम का एक ऐसा ब्रांड खड़ा कर दिया है, जिसका टर्नओवर 45 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है.

एक फूड कोर्ट से आया जादुई आइडिया

निधि हेल्थकेयर सेक्टर में एक दशक से काम कर रही थीं और शिखर बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वैज्ञानिक थे. साल 2015 में एक दिन दोनों एक लोकल फूड कोर्ट में बैठे थे. वहां उन्होंने देखा कि लोग पिज्जा और बर्गर के बड़े-बड़े ब्रांड्स की तरफ भाग रहे हैं, लेकिन भारत का सबसे पसंदीदा स्नैक 'समोसा' अभी भी सिर्फ स्थानीय दुकानों तक ही सीमित है. मार्केट में समोसे का कोई बड़ा नेशनल ब्रांड नहीं था. बस इसी कमी को दोनों ने भांप लिया. शिखर का मानना था कि बैकअप ऑप्शन इंसान को सुस्त बना देता है, इसलिए उन्होंने तुरंत अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और इसके एक साल बाद निधि भी इस सफर में शामिल हो गईं.

आटे के अंदर छुपा है विज्ञान का अनोखा खेल

स्थानीय दुकानों पर मिलने वाले समोसे के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वे घर लाते-लाते या डिलीवरी के दौरान सील जाते हैं यानी वे कुरकुरे नहीं रहते. निधि और शिखर ने अपनी बायोटेक की पढ़ाई का इस्तेमाल इसी समस्या को सुलझाने में किया. उन्होंने समोसे को वैज्ञानिक स्तर पर समझा. शिखर ने बताया कि समोसे के मैदे के आटे के भीतर 'ग्लूटेन बॉन्ड्स' होते हैं. उन्होंने विशेष रोलर्स तैयार किए जो आटे के खास हिस्सों पर दबाव डालते हैं, जिससे ये ग्लूटेन बॉन्ड्स टूट जाते हैं. यही इनका सबसे बड़ा सीक्रेट है, जिसकी वजह से इनका समोसा डिलीवरी के 6 घंटे बाद भी बिल्कुल क्रिस्पी और ताजा रहता है.

300 स्क्वायर फीट की किचन से शुरुआत

शुरुआत में इनके पास बहुत बड़ी टीम नहीं थी. बेंगलुरु में महज 300 स्क्वायर फीट की एक छोटी सी रसोई से इस सफर की शुरुआत हुई थी. तब केवल एक कुक उनके साथ काम करता था. शुरुआत में शिखर खुद ऑर्डर्स की डिलीवरी करने जाते थे और निधि जमीन पर रहकर मैनेजमेंट संभालती थीं. उनका मुख्य फोकस था कि समोसा कम से कम तेल सोखे. वे चाहते तो बेक्ड समोसा भी बना सकते थे, लेकिन भारतीय बाजार को फ्राइड समोसा ही पसंद था. इसलिए उन्होंने स्वाद से समझौता किए बिना सेहतमंद समोसा तैयार किया.

एयर इंडिया से लेकर 8 बड़े शहरों तक सफर



































आज समोसा सिंह सिर्फ बेंगलुरु तक सीमित नहीं है. यह ब्रांड हैदराबाद, विशाखापत्तनम, मैसूर और चेन्नई समेत देश के 8 बड़े शहरों में फैल चुका है. इनके आउटलेट्स से हर दिन लगभग 50,000 समोसे बेचे जाते हैं. इनके पास सिर्फ आलू समोसा ही नहीं, बल्कि मंचूरियन समोसा, चीज चिली समोसा और कचौड़ी-चाट की एक लंबी लिस्ट है. इनकी क्वालिटी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज एयर इंडिया जैसी बड़ी एयरलाइंस के विमानों में भी इनके समोसे परोसे जाते हैं.


जब कोई आपसे कहे कि दो बड़े वैज्ञानिक अपनी शानदार और लाखों की नौकरी छोड़कर समोसा बेचने जा रहे हैं, तो शायद आप भी उन्हें पागल ही कहेंगे. बेंगलुरु के रहने वाले निधि सिंह और शिखर वीर सिंह को भी लोगों ने कुछ ऐसी ही सलाह दी थी. सबने कहा था कि जमी-जमाई आलीशान जिंदगी छोड़कर समोसे के पीछे भागना बेवकूफी है. लेकिन इस कपल के सिर पर अपनी खुद की पहचान बनाने का जुनून सवार था. उन्होंने न सिर्फ अपनी नौकरी छोड़ी, बल्कि अपने सपने को पूरा करने के लिए अपना घर तक बेच दिया. आज इसी पागलपन की बदौलत उन्होंने 'समोसा सिंह' नाम का एक ऐसा ब्रांड खड़ा कर दिया है, जिसका टर्नओवर 45 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है.

एक फूड कोर्ट से आया जादुई आइडिया

निधि हेल्थकेयर सेक्टर में एक दशक से काम कर रही थीं और शिखर बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में वैज्ञानिक थे. साल 2015 में एक दिन दोनों एक लोकल फूड कोर्ट में बैठे थे. वहां उन्होंने देखा कि लोग पिज्जा और बर्गर के बड़े-बड़े ब्रांड्स की तरफ भाग रहे हैं, लेकिन भारत का सबसे पसंदीदा स्नैक 'समोसा' अभी भी सिर्फ स्थानीय दुकानों तक ही सीमित है. मार्केट में समोसे का कोई बड़ा नेशनल ब्रांड नहीं था. बस इसी कमी को दोनों ने भांप लिया. शिखर का मानना था कि बैकअप ऑप्शन इंसान को सुस्त बना देता है, इसलिए उन्होंने तुरंत अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और इसके एक साल बाद निधि भी इस सफर में शामिल हो गईं.

आटे के अंदर छुपा है विज्ञान का अनोखा खेल

स्थानीय दुकानों पर मिलने वाले समोसे के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वे घर लाते-लाते या डिलीवरी के दौरान सील जाते हैं यानी वे कुरकुरे नहीं रहते. निधि और शिखर ने अपनी बायोटेक की पढ़ाई का इस्तेमाल इसी समस्या को सुलझाने में किया. उन्होंने समोसे को वैज्ञानिक स्तर पर समझा. शिखर ने बताया कि समोसे के मैदे के आटे के भीतर 'ग्लूटेन बॉन्ड्स' होते हैं. उन्होंने विशेष रोलर्स तैयार किए जो आटे के खास हिस्सों पर दबाव डालते हैं, जिससे ये ग्लूटेन बॉन्ड्स टूट जाते हैं. यही इनका सबसे बड़ा सीक्रेट है, जिसकी वजह से इनका समोसा डिलीवरी के 6 घंटे बाद भी बिल्कुल क्रिस्पी और ताजा रहता है.

300 स्क्वायर फीट की किचन से शुरुआत

शुरुआत में इनके पास बहुत बड़ी टीम नहीं थी. बेंगलुरु में महज 300 स्क्वायर फीट की एक छोटी सी रसोई से इस सफर की शुरुआत हुई थी. तब केवल एक कुक उनके साथ काम करता था. शुरुआत में शिखर खुद ऑर्डर्स की डिलीवरी करने जाते थे और निधि जमीन पर रहकर मैनेजमेंट संभालती थीं. उनका मुख्य फोकस था कि समोसा कम से कम तेल सोखे. वे चाहते तो बेक्ड समोसा भी बना सकते थे, लेकिन भारतीय बाजार को फ्राइड समोसा ही पसंद था. इसलिए उन्होंने स्वाद से समझौता किए बिना सेहतमंद समोसा तैयार किया.

एयर इंडिया से लेकर 8 बड़े शहरों तक सफर



































आज समोसा सिंह सिर्फ बेंगलुरु तक सीमित नहीं है. यह ब्रांड हैदराबाद, विशाखापत्तनम, मैसूर और चेन्नई समेत देश के 8 बड़े शहरों में फैल चुका है. इनके आउटलेट्स से हर दिन लगभग 50,000 समोसे बेचे जाते हैं. इनके पास सिर्फ आलू समोसा ही नहीं, बल्कि मंचूरियन समोसा, चीज चिली समोसा और कचौड़ी-चाट की एक लंबी लिस्ट है. इनकी क्वालिटी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज एयर इंडिया जैसी बड़ी एयरलाइंस के विमानों में भी इनके समोसे परोसे जाते हैं.


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