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News (खबरीलाल न्यूज़) : अमेरिका ने बदली फार्मा नीति, विदेशी दवाओं पर सख्त टैरिफ से भारत को झटका:

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विदेशी जेनेरिक दवाओं के आयात पर नया टैरिफ ढांचा लागू करने की घोषणा की है। नई नीति के तहत 1 अगस्त 2026 से आयातित जेनेरिक दवाओं पर पहले दो वर्षों तक 0% टैरिफ रहेगा। इसके बाद एक वर्ष के लिए 100% आयात शुल्क लगाया जाएगा और फिर इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा।


ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य अमेरिका में दवाओं के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और भारत व चीन जैसे देशों पर निर्भरता कम करना है। कोविड-19 महामारी के दौरान विदेशी दवाओं पर अत्यधिक निर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम माना गया था।


इस नीति का सबसे बड़ा असर भारत के फार्मा उद्योग पर पड़ सकता है। अमेरिका भारतीय दवा कंपनियों का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है और वहां इस्तेमाल होने वाली लगभग 40% जेनेरिक दवाएं भारत से जाती हैं। हालांकि शुरुआती दो वर्षों तक भारतीय कंपनियों पर तत्काल असर नहीं पड़ेगा, लेकिन बाद में 100% और 200% टैरिफ लागू होने से उनकी लागत और प्रतिस्पर्धा दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इससे भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में बने रहने के लिए स्थानीय विनिर्माण इकाइयों में निवेश बढ़ाना पड़ सकता है।



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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विदेशी जेनेरिक दवाओं के आयात पर नया टैरिफ ढांचा लागू करने की घोषणा की है। नई नीति के तहत 1 अगस्त 2026 से आयातित जेनेरिक दवाओं पर पहले दो वर्षों तक 0% टैरिफ रहेगा। इसके बाद एक वर्ष के लिए 100% आयात शुल्क लगाया जाएगा और फिर इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा।


ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य अमेरिका में दवाओं के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और भारत व चीन जैसे देशों पर निर्भरता कम करना है। कोविड-19 महामारी के दौरान विदेशी दवाओं पर अत्यधिक निर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम माना गया था।


इस नीति का सबसे बड़ा असर भारत के फार्मा उद्योग पर पड़ सकता है। अमेरिका भारतीय दवा कंपनियों का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है और वहां इस्तेमाल होने वाली लगभग 40% जेनेरिक दवाएं भारत से जाती हैं। हालांकि शुरुआती दो वर्षों तक भारतीय कंपनियों पर तत्काल असर नहीं पड़ेगा, लेकिन बाद में 100% और 200% टैरिफ लागू होने से उनकी लागत और प्रतिस्पर्धा दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इससे भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में बने रहने के लिए स्थानीय विनिर्माण इकाइयों में निवेश बढ़ाना पड़ सकता है।


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