बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर मृत सरकारी कर्मचारी की बहन को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। बेटी या बहन की शादी उसके मायके के परिवार से संबंध और संभावित निर्भरता समाप्त नहीं करती। जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने शादीशुदा बहन को अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपात्र मानने वाले शासन के आदेश को रद्द कर दिया है।
बिलासपुर निवासी तारा मिश्रा और उनकी बेटी अमिता दुबे ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। तारा मिश्रा के बेटे और अमिता दुबे के भाई दुर्गेश मिश्रा जिला लोक अभियोजन अधिकारी के कार्यालय में कार्यरत थे। 13 जून 2018 को सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद मां तारा मिश्रा ने अपनी बेटी अमिता को अनुकंपा नियुक्ति देने के लिए आवेदन किया था। पहले आवेदन पर कार्रवाई नहीं होने के कारण हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई।
कोर्ट ने 12 जुलाई 2019 को अधिकारियों को मामले पर विचार करने का निर्देश दिया। इसके बाद शासन ने 19 सितंबर 2019 को आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि 14 जून 2013 की नीति में शादीशुदा बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने का प्रावधान नहीं है।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सायरा खातून बनाम बिहार राज्य के हालिया फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक स्थिति का निर्भरता या पात्रता से कोई सीधा संबंध नहीं है। केवल शादी हो जाने के आधार पर यह मान लेना कि बेटी अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य या आश्रित नहीं रही, संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा बेटे को परिवार की श्रेणी में रखा जाए और शादीशुदा बेटी को केवल उसके वैवाहिक दर्जे के कारण बाहर कर दिया जाए तो यह लैंगिक भेदभाव और रूढ़िवादी सोच पर आधारित वर्गीकरण होगा।
हाई कोर्ट ने 14 जून 2013 की छत्तीसगढ़ शासन की नीति के प्रावधान का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि उसमें सरकारी कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में माता-पिता की अनुशंसा पर भाई या बहन को अनुकंपा नियुक्ति की पात्रता दी गई है। इसमें शादीशुदा बहन को अलग करके अपात्र नहीं किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नीति में उल्लेखित ‘बहन’ में शादीशुदा बहन भी शामिल है। सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर अमिता दुबे को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना कानूनन टिकाऊ नहीं है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन है।
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर मृत सरकारी कर्मचारी की बहन को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। बेटी या बहन की शादी उसके मायके के परिवार से संबंध और संभावित निर्भरता समाप्त नहीं करती। जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने शादीशुदा बहन को अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपात्र मानने वाले शासन के आदेश को रद्द कर दिया है।
बिलासपुर निवासी तारा मिश्रा और उनकी बेटी अमिता दुबे ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। तारा मिश्रा के बेटे और अमिता दुबे के भाई दुर्गेश मिश्रा जिला लोक अभियोजन अधिकारी के कार्यालय में कार्यरत थे। 13 जून 2018 को सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद मां तारा मिश्रा ने अपनी बेटी अमिता को अनुकंपा नियुक्ति देने के लिए आवेदन किया था। पहले आवेदन पर कार्रवाई नहीं होने के कारण हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई।
कोर्ट ने 12 जुलाई 2019 को अधिकारियों को मामले पर विचार करने का निर्देश दिया। इसके बाद शासन ने 19 सितंबर 2019 को आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि 14 जून 2013 की नीति में शादीशुदा बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने का प्रावधान नहीं है।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सायरा खातून बनाम बिहार राज्य के हालिया फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक स्थिति का निर्भरता या पात्रता से कोई सीधा संबंध नहीं है। केवल शादी हो जाने के आधार पर यह मान लेना कि बेटी अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य या आश्रित नहीं रही, संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा बेटे को परिवार की श्रेणी में रखा जाए और शादीशुदा बेटी को केवल उसके वैवाहिक दर्जे के कारण बाहर कर दिया जाए तो यह लैंगिक भेदभाव और रूढ़िवादी सोच पर आधारित वर्गीकरण होगा।
हाई कोर्ट ने 14 जून 2013 की छत्तीसगढ़ शासन की नीति के प्रावधान का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि उसमें सरकारी कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में माता-पिता की अनुशंसा पर भाई या बहन को अनुकंपा नियुक्ति की पात्रता दी गई है। इसमें शादीशुदा बहन को अलग करके अपात्र नहीं किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नीति में उल्लेखित ‘बहन’ में शादीशुदा बहन भी शामिल है। सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर अमिता दुबे को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना कानूनन टिकाऊ नहीं है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन है।


Journalist खबरीलाल















