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News Raipur:: झीरम का सच सामने आने से रोकने में भाजपा डाल रही अड़ंगा - सीएम बघेल:

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 रायपुर : झीरम घाटी
नक्सली हमले के नौ साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा को
आड़े हाथ लिया है। दंतेवाड़ा रवाना होने से पहले उन्होंने हेलीपैड पर मीडिया
से चर्चा में कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) से केस वापस लेने की
बात होती है तो भारत सरकार हमें नहीं देती। दूसरी एफआइआर दर्ज होती है, तो
एनआइए कोर्ट चली जाती है। आयोग की जांच को रोकने के लिए नेता प्रतिपक्ष हाई
कोर्ट चले जाते हैं।
भाजपा अड़ंगा लगाकर सच सामने नहीं आने देना चाहती। सीएम ने कहा कि 25 मई
2013 को झीरम घाटी नक्सली हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस
अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र
कर्मा, उदय मुदलियार सहित 32 लोगों की मौत हुई थी। देश के इतिहास में एक
साथ एक पार्टी के इतनी बड़ी संख्या में नेताओं की कभी हत्या नहीं हुई थी।
दरसअल, प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के साथ ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल
ने झीरम मामले की जांच के लिए एसआइटी का गठन किया था। इसमें 10 सदस्य थे।
इस टीम का नेतृत्व बस्तर के तत्कालीन आइजी विवेकानंद सिन्हा कर रहे थे।
इसके अलावा डीआइजी नक्सल आपरेशन पी. सुंदरराज, एसपी, सुरक्षा वाहिनी माना
एमएल कोटवानी, सेवानिवृत्त डीएसपी नरेंद्र शर्मा, विधि विशेषज्ञ एएन
चतुर्वेदी और विधि-विज्ञान विशेषज्ञ डा. एमके वर्मा भी इसमें शामिल थे।
पुलिस मुख्यालय के आला अधिकारियों की मानें तो जांच के शुरू होने से पहले
ही कोर्ट में मामला चला गया। भाजपा सरकार में झीरम हमले की एनआइए ने जांच
की थी। विशेष अदालत में पेश एनआइए की फाइनल रिपोर्ट में कहा गया था कि झीरम
हमला सरकार को उखाड़ फेंकने की एक चाल थी। यह हमला दहशत फैलाने के लिए किया
गया था। हालांकि कांग्रेस पार्टी इसे एक योजनाबद्ध षड्यंत्र मानती है।
कांग्रेस ने एसआइटी का गठन करके राजनीतिक षड्यंत्र सहित दस बिंदुओं पर जांच
की तैयारी की थी।


अब तक चार एजेंसियों ने की जांच

झीरम
मामले की सबसे पहले जांच छत्तीसगढ़ पुलिस ने शुरू की। जब मामले ने राजनीतिक
रंग लेना शुरू किया और कांग्रेस ने सीबीआइ जांच की मांग की तो एनआइए को
जांच सौंप दी गई। इसके साथ ही भाजपा सरकार ने न्यायिक जांच आयोग का भी गठन
किया। सरकार ने जांच में नए बिंदुओं को शामिल करते हुए न्यायिक जांच आयोग
का कार्यकाल बढ़ाया और नए सदस्यों की नियुक्ति की है। एसआइटी की जांच किसी
नतीजे तक नहीं पहुंच पाई है।

राज्यपाल को सौंपी गई थी न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट

झीरम
घाटी मामले की न्यायिक जांच कर रहे आयोग ने छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुईया
उइके को 4,184 पेज की रिपोर्ट सौंपी थी। झीरम जांच आयोग के सचिव एवं
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (न्यायिक) संतोष कुमार तिवारी ने
राज्यपाल को यह रिपोर्ट सौंपी। राज्यपाल ने विधि विशेषज्ञों की राय लेने के
बाद रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी थी। इस पर राज्य सरकार ने दो सदस्यों
की नियुक्ति के साथ जांच आयोग के कार्यकाल को बढ़ा दिया। भाजपा सरकार ने 28
मई 2013 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश प्रशांत कुमार
मिश्रा की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया था। वर्तमान में मिश्रा आंध्र
प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हैं। हालांकि विपक्ष इस रिपोर्ट
को विधानसभा के पटल पर रखने की लगातार मांग करता रहा है।
 

 


 रायपुर : झीरम घाटी
नक्सली हमले के नौ साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा को
आड़े हाथ लिया है। दंतेवाड़ा रवाना होने से पहले उन्होंने हेलीपैड पर मीडिया
से चर्चा में कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) से केस वापस लेने की
बात होती है तो भारत सरकार हमें नहीं देती। दूसरी एफआइआर दर्ज होती है, तो
एनआइए कोर्ट चली जाती है। आयोग की जांच को रोकने के लिए नेता प्रतिपक्ष हाई
कोर्ट चले जाते हैं।
भाजपा अड़ंगा लगाकर सच सामने नहीं आने देना चाहती। सीएम ने कहा कि 25 मई
2013 को झीरम घाटी नक्सली हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस
अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र
कर्मा, उदय मुदलियार सहित 32 लोगों की मौत हुई थी। देश के इतिहास में एक
साथ एक पार्टी के इतनी बड़ी संख्या में नेताओं की कभी हत्या नहीं हुई थी।
दरसअल, प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के साथ ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल
ने झीरम मामले की जांच के लिए एसआइटी का गठन किया था। इसमें 10 सदस्य थे।
इस टीम का नेतृत्व बस्तर के तत्कालीन आइजी विवेकानंद सिन्हा कर रहे थे।
इसके अलावा डीआइजी नक्सल आपरेशन पी. सुंदरराज, एसपी, सुरक्षा वाहिनी माना
एमएल कोटवानी, सेवानिवृत्त डीएसपी नरेंद्र शर्मा, विधि विशेषज्ञ एएन
चतुर्वेदी और विधि-विज्ञान विशेषज्ञ डा. एमके वर्मा भी इसमें शामिल थे।
पुलिस मुख्यालय के आला अधिकारियों की मानें तो जांच के शुरू होने से पहले
ही कोर्ट में मामला चला गया। भाजपा सरकार में झीरम हमले की एनआइए ने जांच
की थी। विशेष अदालत में पेश एनआइए की फाइनल रिपोर्ट में कहा गया था कि झीरम
हमला सरकार को उखाड़ फेंकने की एक चाल थी। यह हमला दहशत फैलाने के लिए किया
गया था। हालांकि कांग्रेस पार्टी इसे एक योजनाबद्ध षड्यंत्र मानती है।
कांग्रेस ने एसआइटी का गठन करके राजनीतिक षड्यंत्र सहित दस बिंदुओं पर जांच
की तैयारी की थी।


अब तक चार एजेंसियों ने की जांच

झीरम
मामले की सबसे पहले जांच छत्तीसगढ़ पुलिस ने शुरू की। जब मामले ने राजनीतिक
रंग लेना शुरू किया और कांग्रेस ने सीबीआइ जांच की मांग की तो एनआइए को
जांच सौंप दी गई। इसके साथ ही भाजपा सरकार ने न्यायिक जांच आयोग का भी गठन
किया। सरकार ने जांच में नए बिंदुओं को शामिल करते हुए न्यायिक जांच आयोग
का कार्यकाल बढ़ाया और नए सदस्यों की नियुक्ति की है। एसआइटी की जांच किसी
नतीजे तक नहीं पहुंच पाई है।

राज्यपाल को सौंपी गई थी न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट

झीरम
घाटी मामले की न्यायिक जांच कर रहे आयोग ने छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुईया
उइके को 4,184 पेज की रिपोर्ट सौंपी थी। झीरम जांच आयोग के सचिव एवं
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (न्यायिक) संतोष कुमार तिवारी ने
राज्यपाल को यह रिपोर्ट सौंपी। राज्यपाल ने विधि विशेषज्ञों की राय लेने के
बाद रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दी थी। इस पर राज्य सरकार ने दो सदस्यों
की नियुक्ति के साथ जांच आयोग के कार्यकाल को बढ़ा दिया। भाजपा सरकार ने 28
मई 2013 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश प्रशांत कुमार
मिश्रा की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया था। वर्तमान में मिश्रा आंध्र
प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हैं। हालांकि विपक्ष इस रिपोर्ट
को विधानसभा के पटल पर रखने की लगातार मांग करता रहा है।
 

 


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