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अब देशी रेशम से तैयार होंगी महेश्वर साड़ियां:

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महेश्वर की विश्व प्रसिद्ध साड़ियां अब स्वदेशी रेशम से तैयार होंगी।
लॉकडाउन और उसके बाद चायना से आयातित रेशम न मिलने से करघा संचालकों ने
मजबूरी में देशी रेशम का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। कारीगर देशी रेशम में
कई कमियां गिनाते थे, इसलिए उन्हें साढ़े तीन महीने यह बताया ही नहीं गया कि
जिस रेशम से वे साड़ियां बुन रहे हैं, वह स्वदेशी है और कारीगर चायना का
रुका हुआ माल समझकर साड़ी तैयार करते रहे। साढ़े तीन माह बाद राज खुला, तो
कारीगर भी भौचक्के रह गए। दरअसल पहले कारीगर इस माल से हाथ नहीं लगाते थे।
उन्हें दिया भी जाता था तो करघे में धागा फंसने की शिकायत करते थे।


रेशम
की साड़ियां देश-विदेश में मध्यप्रदेश की पहचान हैं। महेश्वर और चंदेरी में
तैयार होने वाली इन साड़ियों में लॉकडाउन से पहले तक पूरी तरह से चायनीज
रेशम का इस्तेमाल होता था। कारीगर देश में तैयार रेशम के धागों को करघे पर
चलाने को तैयार नहीं थे, पर अब बात जरूरत की है। कोरोना महामारी के चलते
उद्योग-धंधे ठप पड़ गए हैं।

इस
महामारी के लिए सीधेतौर पर जिम्मेदार चायना से दुनियाभर में व्यावसायिक
संबंध खत्म होने लगे हैं। ऐसे में दिसंबर 2019 से चायना से रेशम आया भी
नहीं और भविष्य में जल्दी आने की संभावना भी नहीं है। इसे देखते हुए रेशमी
साड़ियों के निर्माण और व्यापार से जुड़े लोगों ने तमाम दिक्कतों को दरकिनार
कर देशी रेशम का इस्तेमाल शुरू किया।


बगैर बताए एक माह कराया काम


कारीगर देशी रेशम से साड़ियां बनाने को तैयार नहीं थे। वे करघे में धागा
फंसने की शिकायत करते थे। लॉकडाउन खुलने के बाद जैसे ही करघे चालू हुए
निर्माताओं ने कारीगरों को चायना का बताकर देशी रेशम दे दिया। कारीगरों को
कुछ दिक्कत हुई, तो व्यापारियों ने बताया कि पुराना स्टॉक होने की वजह से
दिक्कत हो सकती है। आखिर कारीगरों ने बगैर किसी तकलीफ के साड़ियां बना दीं।
कारीगर ने जब दर्जनों साड़ियां तैयार कर लीं, तब उन्हें हकीकत बताई।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश से रेशमी साड़ियों का सालाना 70 से 80 करोड़ का
व्यापार है।


डिजाइन में परिवर्तन भी किया

कारीगरों
की मन:स्थिति बदलने से साड़ियां तो बनने लगीं, पर चायनीज रेशम जैसी
गुणवत्ता अभी नहीं है। व्यापारियों को इस बात का डर भी है कि संकट के दौर
में किया जा रहा यह प्रयोग विश्व विख्यात साख को खराब न कर दे। इसलिए
डिजाइन बदले जा रहे हैं। चटख रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि मोटे
और पतले धागों का जोड़ सारी मेहनत पर पानी न फेर दे। चायनीज रेशम से तैयार
साड़ियों में यह दिक्कत नहीं आती है।


देशी धागे में आया सुधार

व्यापारी
अपने स्तर पर करीब दो साल से देशी धागे की गुणवत्ता सुधारने की कोशिश कर
रहे हैं। चायना में जिस मशीन (सेंसर वाली) से धागे तैयार होते हैं। वह आठ
मशीनें बेंगलुरु में लग गई हैं। उनसे धागे को सुधारने की लगातार कोशिश की
जा रही है। धागे की गुणवत्ता करीब 90 फीसदसुधर भी गई है, पर अभी किसी
लच्छी का वजन बढ़ जाता है, तो किसी का कम हो जाता है, जो बताता है कि धागा
एक जैसा तैयार नहीं हो रहा है। कहीं मोटा तो कहीं पतला हो रहा है।

- लॉकडाउन के बाद कारीगरों को बताए बगैर देशी धागे से साड़ियां
बुनवाई हैं। हम 95 फीसद सफल हैं। डिजाइन में बदलाव करके बारीक कमजोरी छिपाई
जा सकती है। वहीं धागे में भी लगातार सुधार हो रहा है। - कमलेश बिछवे, श्रद्धा हैंडलूम एवं रेशम के विक्रेता

-
देशी रेशम में काफी सुधार हुआ है। पहले की तरह करघा अटकता था, वह अब नहीं
हो रहा है। कीड़े से बनने वाले रेशम की मांग भी बढ़ रही है। -
शैलेंद्र भांगड़े, बुनकर



महेश्वर की विश्व प्रसिद्ध साड़ियां अब स्वदेशी रेशम से तैयार होंगी।
लॉकडाउन और उसके बाद चायना से आयातित रेशम न मिलने से करघा संचालकों ने
मजबूरी में देशी रेशम का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। कारीगर देशी रेशम में
कई कमियां गिनाते थे, इसलिए उन्हें साढ़े तीन महीने यह बताया ही नहीं गया कि
जिस रेशम से वे साड़ियां बुन रहे हैं, वह स्वदेशी है और कारीगर चायना का
रुका हुआ माल समझकर साड़ी तैयार करते रहे। साढ़े तीन माह बाद राज खुला, तो
कारीगर भी भौचक्के रह गए। दरअसल पहले कारीगर इस माल से हाथ नहीं लगाते थे।
उन्हें दिया भी जाता था तो करघे में धागा फंसने की शिकायत करते थे।


रेशम
की साड़ियां देश-विदेश में मध्यप्रदेश की पहचान हैं। महेश्वर और चंदेरी में
तैयार होने वाली इन साड़ियों में लॉकडाउन से पहले तक पूरी तरह से चायनीज
रेशम का इस्तेमाल होता था। कारीगर देश में तैयार रेशम के धागों को करघे पर
चलाने को तैयार नहीं थे, पर अब बात जरूरत की है। कोरोना महामारी के चलते
उद्योग-धंधे ठप पड़ गए हैं।

इस
महामारी के लिए सीधेतौर पर जिम्मेदार चायना से दुनियाभर में व्यावसायिक
संबंध खत्म होने लगे हैं। ऐसे में दिसंबर 2019 से चायना से रेशम आया भी
नहीं और भविष्य में जल्दी आने की संभावना भी नहीं है। इसे देखते हुए रेशमी
साड़ियों के निर्माण और व्यापार से जुड़े लोगों ने तमाम दिक्कतों को दरकिनार
कर देशी रेशम का इस्तेमाल शुरू किया।


बगैर बताए एक माह कराया काम


कारीगर देशी रेशम से साड़ियां बनाने को तैयार नहीं थे। वे करघे में धागा
फंसने की शिकायत करते थे। लॉकडाउन खुलने के बाद जैसे ही करघे चालू हुए
निर्माताओं ने कारीगरों को चायना का बताकर देशी रेशम दे दिया। कारीगरों को
कुछ दिक्कत हुई, तो व्यापारियों ने बताया कि पुराना स्टॉक होने की वजह से
दिक्कत हो सकती है। आखिर कारीगरों ने बगैर किसी तकलीफ के साड़ियां बना दीं।
कारीगर ने जब दर्जनों साड़ियां तैयार कर लीं, तब उन्हें हकीकत बताई।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश से रेशमी साड़ियों का सालाना 70 से 80 करोड़ का
व्यापार है।


डिजाइन में परिवर्तन भी किया

कारीगरों
की मन:स्थिति बदलने से साड़ियां तो बनने लगीं, पर चायनीज रेशम जैसी
गुणवत्ता अभी नहीं है। व्यापारियों को इस बात का डर भी है कि संकट के दौर
में किया जा रहा यह प्रयोग विश्व विख्यात साख को खराब न कर दे। इसलिए
डिजाइन बदले जा रहे हैं। चटख रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि मोटे
और पतले धागों का जोड़ सारी मेहनत पर पानी न फेर दे। चायनीज रेशम से तैयार
साड़ियों में यह दिक्कत नहीं आती है।


देशी धागे में आया सुधार

व्यापारी
अपने स्तर पर करीब दो साल से देशी धागे की गुणवत्ता सुधारने की कोशिश कर
रहे हैं। चायना में जिस मशीन (सेंसर वाली) से धागे तैयार होते हैं। वह आठ
मशीनें बेंगलुरु में लग गई हैं। उनसे धागे को सुधारने की लगातार कोशिश की
जा रही है। धागे की गुणवत्ता करीब 90 फीसदसुधर भी गई है, पर अभी किसी
लच्छी का वजन बढ़ जाता है, तो किसी का कम हो जाता है, जो बताता है कि धागा
एक जैसा तैयार नहीं हो रहा है। कहीं मोटा तो कहीं पतला हो रहा है।

- लॉकडाउन के बाद कारीगरों को बताए बगैर देशी धागे से साड़ियां
बुनवाई हैं। हम 95 फीसद सफल हैं। डिजाइन में बदलाव करके बारीक कमजोरी छिपाई
जा सकती है। वहीं धागे में भी लगातार सुधार हो रहा है। - कमलेश बिछवे, श्रद्धा हैंडलूम एवं रेशम के विक्रेता

-
देशी रेशम में काफी सुधार हुआ है। पहले की तरह करघा अटकता था, वह अब नहीं
हो रहा है। कीड़े से बनने वाले रेशम की मांग भी बढ़ रही है। -
शैलेंद्र भांगड़े, बुनकर


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