मनुष्य का जीवन सच में क्षणभंगुर है।उसका अगला पल कैसा होगा? कोई नहीं जान सकता। इस बात को आज 26 जून 2025 को कवि पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे जी के आकस्मिक देहावसान की खबर ने फिर से अटल सत्य करार दिया। मन मस्तिष्क को हिला कर रख दिया। यकीन ही नहीं हो रहा है कि सदैव हंसने हंसाने वाला कवि ह्दयी व्यक्ति सदा सदा के लिए दुनिया से इस तरह अनायास दूरी बना लेगा।
टायगर अभी जिंदा हे, हास्य का कोकड़ा व्यंग्य का परिंदा,ब्लेक डायमंड, जैसे संज्ञा स्वयं को देने वाले, स्वयं पर व्यंग्य करने वाले और खुद की हंसी उड़ाने वाले खुशमिजाज कविश्री दुबे जी के निधन ने समूचे छत्तीसगढ़ सहित राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय काव्य जगत को झकझोर कर रख दिया है, किन्तु "ईश्वर इच्छा के आगे सब नतमस्तक हैं" को एक बार फिर से स्वीकारना ही पड़ा।
छत्तीसगढ़ की धरा से निकलकर दिल्ली के लाल किले में और अंतरराष्ट्रीय काव्य जगत में छत्तीसगढ़ सहित छत्तीसगढ़ी भाषा की पहचान बनाने के मामले में वे सदैव अग्रणी रहे और इतिहास रच कर चले गए। किसी कवि श्री की लिखी हुई यह पंक्तियां सटीक बैठती हैं पद्मश्री दुबे जी पर- कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे में ढल गए ।कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे बदल गए"
वर्ष 1982-83 में मेरी पहली मुलाकात उनसे दुर्ग में हुई थी। उस दौरान रामहृदय तिवारी जी द्वारा स्थापित नाट्य संस्था क्षितिज रंग शिविर में हम रंगकर्मियों का दल बेहद सक्रिय था। तब हमने संतोष जैन जी के निर्देशन में स्व.सुरेन्द्र दुबे जी के लिखित नाटक का मंचन किया था। नाट्य मंचन के सिलसिले में भेंट होती थी तो पद्मश्री दुबे जी कहते थे " मनखे अपन जिनगी म रोजाना, हर पल, हर घड़ी नवा नवा नाटक करत रहिथे। नवा नवा किरदार ल जीयत रहिथे"। विजय भाई, इन सबके बीच हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि सीमेंट - कांक्रीट से बने रंगमंच पर जारी नाटक के अंत का पता होता है, किन्तु जिंदगी के रंगमंच पर चल रहे नाटक में किसका पर्दा कब गिरेगा? कोई नहीं जानता। उनकी कही ए बातें याद करके आंखें नम हैं।
हाल ही में रायपुर प्रेस क्लब में रामेश्वर वैष्णव जी की किताब "ऊत्ता धुर्रा" के विमोचन समारोह में भी उनसे चर्चा हुई थी।यद्यपि वे जल्दबाजी में थे,उन्हें दिल्ली जाना था, फिर भी पर्याप्त समय उन्होंने दिया था। मुझे भी अपनी किताब के संबंध में उनसे बातचीत करनी थी।बाद में फोन पर जब जब उनसे बात होती थी अथवा मुलाकात होती थी तो उन्हें सुनकर यही लगता था की "आम से हटकर कुछ खास करने की कोशिश करने वालों को ही कामयाबी मिलती है"।
बातों-बातों में मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहते थे- "विजय भाई, ते तों रंगकर्मी आस, कुछू न कुछू करते रहिथस। बस अतेक सुरता राखबे कि अपन काम ल हमेशा उम्दा करबे,ताकि परदा गिरे के बाद भी ताली बाजत रहय।"।
सोच रहा हूं कि पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे जी की जिंदगी का पर्दा तो गिर गया, पर उनकी कही हुई बातें,उनके काम,उनके यश की चर्चा चहुं ओर हो रही है।वे बता गए कि आदमी की पहचान उसके काम से ही होती।अपने किरदार को वे खूब जिए, जी भरकर जिए। उनकी जिंदगी का परदा गिर गया पर उनका नाम- काम अजर- अमर हो गया। उनके आकस्मिक निधन से हतप्रभ मन और अंतरात्मा से आवाज आ रही है कि दीन दुनिया को वे हंसाते हंसाते चले गये पर संदेसा छोड़ गए -जो तू आया मूड़ जगत में जग हंसे तू रोए।ऐसी करनी कर चल भैया तू हंसे जग रोए।
उन्हें शत-शत नमन। अश्रुपूरित सादर श्रद्धांजलि।
मनुष्य का जीवन सच में क्षणभंगुर है।उसका अगला पल कैसा होगा? कोई नहीं जान सकता। इस बात को आज 26 जून 2025 को कवि पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे जी के आकस्मिक देहावसान की खबर ने फिर से अटल सत्य करार दिया। मन मस्तिष्क को हिला कर रख दिया। यकीन ही नहीं हो रहा है कि सदैव हंसने हंसाने वाला कवि ह्दयी व्यक्ति सदा सदा के लिए दुनिया से इस तरह अनायास दूरी बना लेगा।
टायगर अभी जिंदा हे, हास्य का कोकड़ा व्यंग्य का परिंदा,ब्लेक डायमंड, जैसे संज्ञा स्वयं को देने वाले, स्वयं पर व्यंग्य करने वाले और खुद की हंसी उड़ाने वाले खुशमिजाज कविश्री दुबे जी के निधन ने समूचे छत्तीसगढ़ सहित राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय काव्य जगत को झकझोर कर रख दिया है, किन्तु "ईश्वर इच्छा के आगे सब नतमस्तक हैं" को एक बार फिर से स्वीकारना ही पड़ा।
छत्तीसगढ़ की धरा से निकलकर दिल्ली के लाल किले में और अंतरराष्ट्रीय काव्य जगत में छत्तीसगढ़ सहित छत्तीसगढ़ी भाषा की पहचान बनाने के मामले में वे सदैव अग्रणी रहे और इतिहास रच कर चले गए। किसी कवि श्री की लिखी हुई यह पंक्तियां सटीक बैठती हैं पद्मश्री दुबे जी पर- कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे में ढल गए ।कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे बदल गए"
वर्ष 1982-83 में मेरी पहली मुलाकात उनसे दुर्ग में हुई थी। उस दौरान रामहृदय तिवारी जी द्वारा स्थापित नाट्य संस्था क्षितिज रंग शिविर में हम रंगकर्मियों का दल बेहद सक्रिय था। तब हमने संतोष जैन जी के निर्देशन में स्व.सुरेन्द्र दुबे जी के लिखित नाटक का मंचन किया था। नाट्य मंचन के सिलसिले में भेंट होती थी तो पद्मश्री दुबे जी कहते थे " मनखे अपन जिनगी म रोजाना, हर पल, हर घड़ी नवा नवा नाटक करत रहिथे। नवा नवा किरदार ल जीयत रहिथे"। विजय भाई, इन सबके बीच हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि सीमेंट - कांक्रीट से बने रंगमंच पर जारी नाटक के अंत का पता होता है, किन्तु जिंदगी के रंगमंच पर चल रहे नाटक में किसका पर्दा कब गिरेगा? कोई नहीं जानता। उनकी कही ए बातें याद करके आंखें नम हैं।
हाल ही में रायपुर प्रेस क्लब में रामेश्वर वैष्णव जी की किताब "ऊत्ता धुर्रा" के विमोचन समारोह में भी उनसे चर्चा हुई थी।यद्यपि वे जल्दबाजी में थे,उन्हें दिल्ली जाना था, फिर भी पर्याप्त समय उन्होंने दिया था। मुझे भी अपनी किताब के संबंध में उनसे बातचीत करनी थी।बाद में फोन पर जब जब उनसे बात होती थी अथवा मुलाकात होती थी तो उन्हें सुनकर यही लगता था की "आम से हटकर कुछ खास करने की कोशिश करने वालों को ही कामयाबी मिलती है"।
बातों-बातों में मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहते थे- "विजय भाई, ते तों रंगकर्मी आस, कुछू न कुछू करते रहिथस। बस अतेक सुरता राखबे कि अपन काम ल हमेशा उम्दा करबे,ताकि परदा गिरे के बाद भी ताली बाजत रहय।"।
सोच रहा हूं कि पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे जी की जिंदगी का पर्दा तो गिर गया, पर उनकी कही हुई बातें,उनके काम,उनके यश की चर्चा चहुं ओर हो रही है।वे बता गए कि आदमी की पहचान उसके काम से ही होती।अपने किरदार को वे खूब जिए, जी भरकर जिए। उनकी जिंदगी का परदा गिर गया पर उनका नाम- काम अजर- अमर हो गया। उनके आकस्मिक निधन से हतप्रभ मन और अंतरात्मा से आवाज आ रही है कि दीन दुनिया को वे हंसाते हंसाते चले गये पर संदेसा छोड़ गए -जो तू आया मूड़ जगत में जग हंसे तू रोए।ऐसी करनी कर चल भैया तू हंसे जग रोए।
उन्हें शत-शत नमन। अश्रुपूरित सादर श्रद्धांजलि।



Journalist खबरीलाल














