कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई की मतगणना की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए चुनौतियों का पहाड़ खड़ा होता जा रहा है. पिछले 96 घंटों के भीतर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो को एक के बाद एक चार ऐसे झटके लगे हैं, जिन्होंने न केवल उनकी चुनावी रणनीति को बैकफुट पर धकेल दिया है, बल्कि पार्टी के भीतर भी हड़कंप मचा दिया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘दीदी’ के लिए यह चार दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं रहे हैं, जहां कानूनी मोर्चे से लेकर जनमत के अनुमानों तक हर तरफ से निराशा हाथ लगी है.
ममता बनर्जी को सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका मतदान खत्म होते ही मिला. देश की तमाम बड़ी सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल ने टीएमसी की सत्ता से विदाई और बीजेपी की ऐतिहासिक जीत की भविष्यवाणी की है. अधिकांश एग्जिट पोल में बीजेपी को 150 से 170 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाया गया है, जबकि टीएमसी को 120 सीटों के आसपास सिमटता बताया गया है. इन आंकड़ों ने टीएमसी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया है और पार्टी के भीतर हार की आशंका गहरा गई है.
मतगणना की निष्पक्षता को लेकर ममता सरकार को दूसरा झटका राज्य की उच्च न्यायालय से लगा. कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के उस फैसले पर मुहर लगा दी, जिसमें कहा गया था कि वोटों की गिनती के लिए राज्यकर्मियों के बजाय केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती की जाएगी. टीएमसी को उम्मीद थी कि स्थानीय कर्मचारियों की मौजूदगी से उन्हें कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन कोर्ट के इस फैसले ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया.
अदालती कार्यवाही के बीच चुनाव आयोग ने भी टीएमसी को करारा झटका दिया. ममता बनर्जी की पार्टी ने आयोग से अपील की थी कि मतगणना और चुनाव ड्यूटी में राज्य के कर्मचारियों को शामिल किया जाए, क्योंकि वे स्थानीय परिस्थितियों से वाकिफ होते हैं. हालांकि, चुनाव आयोग ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय कर्मचारियों का पैनल ही मतगणना का जिम्मा संभालेगा. आयोग के इस रुख ने टीएमसी के ‘बूथ मैनेजमेंट’ और ‘काउंटिंग मैनेजमेंट’ के दावों की हवा निकाल दी.
ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी कानूनी हार सुप्रीम कोर्ट में हुई. टीएमसी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और साफ कर दिया कि मतगणना केवल केंद्रीय कर्मचारियों की निगरानी में ही होगी. अदालत ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्ष चुनाव कराने के अधिकार को सर्वोपरि माना. यह ‘दीदी’ के लिए चार दिनों में चौथा और सबसे निर्णायक झटका साबित हुआ.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 4 मई को मतगणना के दिन ममता बनर्जी को पांचवां और सबसे बड़ा झटका लगेगा? यदि एग्जिट पोल के आंकड़े हकीकत में तब्दील होते हैं और केंद्रीय कर्मचारियों की सख्त निगरानी में होने वाली गिनती में टीएमसी पिछड़ती है, तो यह बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होगी. भवानीपुर से लेकर नंदीग्राम तक, हर सीट पर अब कांटे की टक्कर है और ‘दीदी’ के लिए इन झटकों से उबरना आसान नहीं होगा.
4 मई के नतीजे यह तय करेंगे कि ममता बनर्जी की ‘लंका’ को इन झटकों ने कितना नुकसान पहुंचाया है. फिलहाल, पूरी टीएमसी लीडरशिप रक्षात्मक मुद्रा में है और बीजेपी खेमे में उत्साह का माहौल है. क्या बंगाल में ‘कमल’ खिलेगा या ‘दीदी’ कोई आखिरी करिश्मा दिखाएंगी? इसका फैसला अब बस कुछ ही घंटों की दूरी पर है.
कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई की मतगणना की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए चुनौतियों का पहाड़ खड़ा होता जा रहा है. पिछले 96 घंटों के भीतर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो को एक के बाद एक चार ऐसे झटके लगे हैं, जिन्होंने न केवल उनकी चुनावी रणनीति को बैकफुट पर धकेल दिया है, बल्कि पार्टी के भीतर भी हड़कंप मचा दिया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘दीदी’ के लिए यह चार दिन किसी बुरे सपने से कम नहीं रहे हैं, जहां कानूनी मोर्चे से लेकर जनमत के अनुमानों तक हर तरफ से निराशा हाथ लगी है.
ममता बनर्जी को सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका मतदान खत्म होते ही मिला. देश की तमाम बड़ी सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल ने टीएमसी की सत्ता से विदाई और बीजेपी की ऐतिहासिक जीत की भविष्यवाणी की है. अधिकांश एग्जिट पोल में बीजेपी को 150 से 170 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाया गया है, जबकि टीएमसी को 120 सीटों के आसपास सिमटता बताया गया है. इन आंकड़ों ने टीएमसी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया है और पार्टी के भीतर हार की आशंका गहरा गई है.
मतगणना की निष्पक्षता को लेकर ममता सरकार को दूसरा झटका राज्य की उच्च न्यायालय से लगा. कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के उस फैसले पर मुहर लगा दी, जिसमें कहा गया था कि वोटों की गिनती के लिए राज्यकर्मियों के बजाय केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती की जाएगी. टीएमसी को उम्मीद थी कि स्थानीय कर्मचारियों की मौजूदगी से उन्हें कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन कोर्ट के इस फैसले ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया.
अदालती कार्यवाही के बीच चुनाव आयोग ने भी टीएमसी को करारा झटका दिया. ममता बनर्जी की पार्टी ने आयोग से अपील की थी कि मतगणना और चुनाव ड्यूटी में राज्य के कर्मचारियों को शामिल किया जाए, क्योंकि वे स्थानीय परिस्थितियों से वाकिफ होते हैं. हालांकि, चुनाव आयोग ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय कर्मचारियों का पैनल ही मतगणना का जिम्मा संभालेगा. आयोग के इस रुख ने टीएमसी के ‘बूथ मैनेजमेंट’ और ‘काउंटिंग मैनेजमेंट’ के दावों की हवा निकाल दी.
ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी कानूनी हार सुप्रीम कोर्ट में हुई. टीएमसी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और साफ कर दिया कि मतगणना केवल केंद्रीय कर्मचारियों की निगरानी में ही होगी. अदालत ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्ष चुनाव कराने के अधिकार को सर्वोपरि माना. यह ‘दीदी’ के लिए चार दिनों में चौथा और सबसे निर्णायक झटका साबित हुआ.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 4 मई को मतगणना के दिन ममता बनर्जी को पांचवां और सबसे बड़ा झटका लगेगा? यदि एग्जिट पोल के आंकड़े हकीकत में तब्दील होते हैं और केंद्रीय कर्मचारियों की सख्त निगरानी में होने वाली गिनती में टीएमसी पिछड़ती है, तो यह बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होगी. भवानीपुर से लेकर नंदीग्राम तक, हर सीट पर अब कांटे की टक्कर है और ‘दीदी’ के लिए इन झटकों से उबरना आसान नहीं होगा.
4 मई के नतीजे यह तय करेंगे कि ममता बनर्जी की ‘लंका’ को इन झटकों ने कितना नुकसान पहुंचाया है. फिलहाल, पूरी टीएमसी लीडरशिप रक्षात्मक मुद्रा में है और बीजेपी खेमे में उत्साह का माहौल है. क्या बंगाल में ‘कमल’ खिलेगा या ‘दीदी’ कोई आखिरी करिश्मा दिखाएंगी? इसका फैसला अब बस कुछ ही घंटों की दूरी पर है.



Journalist खबरीलाल














