रायपुर, 9 जून 2026: संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय, छत्तीसगढ़ द्वारा मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में आयोजित पारंपरिक शिल्प एवं कला प्रशिक्षण शिविर 'आकार 2026' का मंगलवार को भव्य समापन हुआ।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि रायपुर लोकसभा क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल रहे। उन्होंने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत समापन किया और शिविर के उत्कृष्ट प्रशिक्षकों (कला गुरुओं) को स्मृति चिह्न व प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। समारोह को संबोधित करते हुए सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहा, "मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि साल 2004 में संस्कृति मंत्री के रूप में मैंने इस 'आकार' शिविर की शुरुआत की थी। आज इतने वर्षों बाद भी यह आयोजन उसी निरंतरता और भव्यता के साथ हमारी पारंपरिक कलाओं को सहेज रहा है। 2004 में जो लोग इस मुहिम से जुड़े थे, वे आज भी पूरी निष्ठा के साथ छत्तीसगढ़ की कला को जीवित रखने में अपना योगदान दे रहे हैं।"
75 वर्ष के बुजुर्ग से लेकर बच्चों तक में दिखा कला के प्रति उत्साह - श्री अग्रवाल ने शिविर के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि कला की कोई उम्र नहीं होती। इस शिविर में 75 साल के बुजुर्ग से लेकर छोटे-छोटे बच्चों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। बोनसाई प्रशिक्षण लेने वाले एक बुजुर्ग का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में हमेशा छोटा और विनम्र बनकर रहने की कला हमें प्रकृति और बोनसाई जैसे शिल्पों से सीखने को मिलती है। उन्होंने कहा कि आज जब कंक्रीट और टाइल्स के दौर में बच्चे मिट्टी से दूर हो गए हैं, ऐसे समय में 'आकार' शिविर बच्चों को अपनी मिट्टी से जोड़ने का एक सराहनीय जरिया बना है। जब बच्चे मिट्टी से खेलना और सृजन करना सीखेंगे, तभी उनके जीवन में वास्तविक आनंद आएगा।छत्तीसगढ़ के पांचों संभागों में आयोजित हो 'आकार' शिविर, स्थल को बनाएं और आकर्षक - सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर जोर देते हुए कहा कि हमारा पंथी नृत्य दुनिया के सबसे तेज नृत्यों में से एक है। हमारी गोदना कला, रजवार आर्ट, टेराकोटा और बस्तर के काष्ठ व बांस शिल्प की अद्भुत पहचान है। उन्होंने संस्कृति विभाग के संचालक श्री संजय कन्नौजे को सुझाव देते हुए कहा कि 'आकार' शिविर के आयोजन स्थल को और अधिक आकर्षक व सुंदर बनाया जाए ताकि बच्चों में इसके प्रति और ज्यादा आकर्षण पैदा हो। साथ ही, उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि 'आकार' शिविर को केवल रायपुर तक सीमित न रखकर छत्तीसगढ़ के सभी पांचों संभागों (बिलासपुर, दुर्ग, बस्तर/जगदलपुर, सरगुजा/अंबिकापुर) के स्तर पर भी आयोजित किया जाना चाहिए, ताकि प्रदेश के कोने-कोने के बच्चों को अपनी कला से जुड़ने का मौका मिले।
रोजगार और बाजार से जुड़ें पारंपरिक शिल्प, खुले पारंपरिक गहनों की दुकान - कलाकारों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बात करते हुए सांसद जी ने कहा कि छत्तीसगढ़ के पारंपरिक गहनों की अद्भुत पहचान है, जो सोने-चांदी के मुकाबले काफी किफायती और खूबसूरत होते हैं। उन्होंने संस्कृति विभाग के अधिकारियों को निर्देशित करते हुए कहा कि परिसर में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक गहनों की एक स्थायी दुकान खुलवाई जाए, जिससे गहने बनाने वाले पारंपरिक कलाकारों को सीधा बाजार और रोजगार मिल सके तथा आम लोग भी आसानी से इन्हें खरीद सकें। उन्होंने कहा कि यहाँ सीखी गई कला केवल शौक नहीं, बल्कि आने वाले समय में युवाओं के लिए आय का एक बड़ा जरिया बन सकती है।क्रिएटिविटी से शांत होता है बच्चों का मन - श्री अग्रवाल ने पालकों और बच्चों से अपील करते हुए कहा कि आजकल बच्चे मानसिक रूप से थोड़े अशांत रहते हैं। उनके भीतर की रचनात्मकता और सृजनशीलता (क्रिएटिविटी) को उभारना बेहद जरूरी है। जब बच्चे कुछ नया गढ़ना शुरू करते हैं, तो उनका दिमाग और मन शांत होता है, जिससे वे पढ़ाई और जीवन के हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं। उन्होंने सभी प्रशिक्षणार्थियों से आग्रह किया कि यहाँ सीखी गई कला को भूलें नहीं, बल्कि सालभर इसका अभ्यास करते रहें।
इस अवसर पर फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष सुश्री मोना सेन, संस्कृति विभाग के संचालक श्री संजय कन्नौजे, आकार के प्रभारी श्री दुर्योधन महानंद, संस्कृति प्रेमी श्री प्रताप पारख सहित बड़ी संख्या में कला गुरु, प्रशिक्षु, गणमान्य नागरिक और कला प्रेमी उपस्थित रहे। श्री अग्रवाल ने संस्कृति व पुरातत्व विभाग के समस्त अधिकारियों, कर्मचारियों, कला गुरुओं और बच्चों को सफल आयोजन के लिए बधाई व शुभकामनाएं दीं।
रायपुर, 9 जून 2026: संस्कृति एवं राजभाषा संचालनालय, छत्तीसगढ़ द्वारा मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में आयोजित पारंपरिक शिल्प एवं कला प्रशिक्षण शिविर 'आकार 2026' का मंगलवार को भव्य समापन हुआ।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि रायपुर लोकसभा क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल रहे। उन्होंने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत समापन किया और शिविर के उत्कृष्ट प्रशिक्षकों (कला गुरुओं) को स्मृति चिह्न व प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। समारोह को संबोधित करते हुए सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहा, "मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि साल 2004 में संस्कृति मंत्री के रूप में मैंने इस 'आकार' शिविर की शुरुआत की थी। आज इतने वर्षों बाद भी यह आयोजन उसी निरंतरता और भव्यता के साथ हमारी पारंपरिक कलाओं को सहेज रहा है। 2004 में जो लोग इस मुहिम से जुड़े थे, वे आज भी पूरी निष्ठा के साथ छत्तीसगढ़ की कला को जीवित रखने में अपना योगदान दे रहे हैं।"
75 वर्ष के बुजुर्ग से लेकर बच्चों तक में दिखा कला के प्रति उत्साह - श्री अग्रवाल ने शिविर के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि कला की कोई उम्र नहीं होती। इस शिविर में 75 साल के बुजुर्ग से लेकर छोटे-छोटे बच्चों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। बोनसाई प्रशिक्षण लेने वाले एक बुजुर्ग का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में हमेशा छोटा और विनम्र बनकर रहने की कला हमें प्रकृति और बोनसाई जैसे शिल्पों से सीखने को मिलती है। उन्होंने कहा कि आज जब कंक्रीट और टाइल्स के दौर में बच्चे मिट्टी से दूर हो गए हैं, ऐसे समय में 'आकार' शिविर बच्चों को अपनी मिट्टी से जोड़ने का एक सराहनीय जरिया बना है। जब बच्चे मिट्टी से खेलना और सृजन करना सीखेंगे, तभी उनके जीवन में वास्तविक आनंद आएगा।छत्तीसगढ़ के पांचों संभागों में आयोजित हो 'आकार' शिविर, स्थल को बनाएं और आकर्षक - सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर जोर देते हुए कहा कि हमारा पंथी नृत्य दुनिया के सबसे तेज नृत्यों में से एक है। हमारी गोदना कला, रजवार आर्ट, टेराकोटा और बस्तर के काष्ठ व बांस शिल्प की अद्भुत पहचान है। उन्होंने संस्कृति विभाग के संचालक श्री संजय कन्नौजे को सुझाव देते हुए कहा कि 'आकार' शिविर के आयोजन स्थल को और अधिक आकर्षक व सुंदर बनाया जाए ताकि बच्चों में इसके प्रति और ज्यादा आकर्षण पैदा हो। साथ ही, उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि 'आकार' शिविर को केवल रायपुर तक सीमित न रखकर छत्तीसगढ़ के सभी पांचों संभागों (बिलासपुर, दुर्ग, बस्तर/जगदलपुर, सरगुजा/अंबिकापुर) के स्तर पर भी आयोजित किया जाना चाहिए, ताकि प्रदेश के कोने-कोने के बच्चों को अपनी कला से जुड़ने का मौका मिले।
रोजगार और बाजार से जुड़ें पारंपरिक शिल्प, खुले पारंपरिक गहनों की दुकान - कलाकारों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बात करते हुए सांसद जी ने कहा कि छत्तीसगढ़ के पारंपरिक गहनों की अद्भुत पहचान है, जो सोने-चांदी के मुकाबले काफी किफायती और खूबसूरत होते हैं। उन्होंने संस्कृति विभाग के अधिकारियों को निर्देशित करते हुए कहा कि परिसर में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक गहनों की एक स्थायी दुकान खुलवाई जाए, जिससे गहने बनाने वाले पारंपरिक कलाकारों को सीधा बाजार और रोजगार मिल सके तथा आम लोग भी आसानी से इन्हें खरीद सकें। उन्होंने कहा कि यहाँ सीखी गई कला केवल शौक नहीं, बल्कि आने वाले समय में युवाओं के लिए आय का एक बड़ा जरिया बन सकती है।क्रिएटिविटी से शांत होता है बच्चों का मन - श्री अग्रवाल ने पालकों और बच्चों से अपील करते हुए कहा कि आजकल बच्चे मानसिक रूप से थोड़े अशांत रहते हैं। उनके भीतर की रचनात्मकता और सृजनशीलता (क्रिएटिविटी) को उभारना बेहद जरूरी है। जब बच्चे कुछ नया गढ़ना शुरू करते हैं, तो उनका दिमाग और मन शांत होता है, जिससे वे पढ़ाई और जीवन के हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं। उन्होंने सभी प्रशिक्षणार्थियों से आग्रह किया कि यहाँ सीखी गई कला को भूलें नहीं, बल्कि सालभर इसका अभ्यास करते रहें।
इस अवसर पर फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष सुश्री मोना सेन, संस्कृति विभाग के संचालक श्री संजय कन्नौजे, आकार के प्रभारी श्री दुर्योधन महानंद, संस्कृति प्रेमी श्री प्रताप पारख सहित बड़ी संख्या में कला गुरु, प्रशिक्षु, गणमान्य नागरिक और कला प्रेमी उपस्थित रहे। श्री अग्रवाल ने संस्कृति व पुरातत्व विभाग के समस्त अधिकारियों, कर्मचारियों, कला गुरुओं और बच्चों को सफल आयोजन के लिए बधाई व शुभकामनाएं दीं।



Journalist खबरीलाल














