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Health CG (खबरीलाल न्यूज़) :: सिम्स में डॉक्टरों ने बचाई युवक की जान : गले की कटी श्वासनली की आपातकालीन सर्जरी कर दिया नया जीवन:

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रायपुर, 2 जून 2026/ छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) बिलासपुर के चिकित्सकों ने अपनी विशेषज्ञता, त्वरित निर्णय क्षमता एवं उत्कृष्ट टीमवर्क का परिचय देते हुए एक 26 वर्षीय युवक की जान बचाने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। गले में गंभीर एवं जानलेवा चोट के साथ अस्पताल पहुंचे युवक का आपातकालीन ऑपरेशन कर न केवल उसकी सांसों को सुरक्षित किया गया, बल्कि क्षतिग्रस्त श्वासनली की सफल मरम्मत भी की गई। चिकित्सकों की इस उपलब्धि ने एक बार फिर सिम्स की आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की दक्षता को सिद्ध किया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शादाब खान (26 वर्ष) को गंभीर अवस्था में सिम्स के कैजुअल्टी विभाग में लाया गया। मरीज के गले में गहरा खुला घाव था तथा श्वासनली कट जाने के कारण सांस लेने की प्रक्रिया बाधित हो चुकी थी। घाव से हवा का स्पष्ट आवागमन हो रहा था, जो चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यंत गंभीर स्थिति थी। चिकित्सा विज्ञान में इस प्रकार की चोट को लैरिंगोट्रेकियल इंजरी (Laryngotracheal Injury) कहा जाता है।

मरीज के शरीर में ऑक्सीजन का स्तर लगातार गिर रहा था और उसकी स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई थी। ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. आरती पाण्डेय, सह प्राध्यापक  विद्याभूषण साहू सहायक प्राध्यापक डॉ. श्वेता मित्तल ने तत्काल स्थिति का आकलन कर मरीज को आपातकालीन ऑपरेशन थिएटर ले जाने का निर्णय लिया। चिकित्सकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मरीज के श्वास मार्ग को सुरक्षित करना था, क्योंकि थोड़ी सी भी देरी जानलेवा साबित हो सकती थी।

ऑपरेशन थिएटर में पहुंचते ही चिकित्सकों ने आपातकालीन ट्रेकियोस्टॉमी कर मरीज का श्वास मार्ग सुरक्षित किया और ऑक्सीजन संतृप्ति को सामान्य स्तर पर लाया गया। इसके बाद शुरू हुई अत्यंत जटिल एवं चुनौतीपूर्ण सर्जरी, जिसमें श्वासनली की मरम्मत के साथ गर्दन की अन्य क्षतिग्रस्त संरचनाओं को भी पुनर्स्थापित किया गया।

लगभग दो घंटे तक चली इस सर्जरी में श्वासनली, उसके ऊपर की मांसपेशियों, फैशियल लेयर तथा त्वचा को क्रमशः पांच परतों में जोड़कर मरम्मत की गई। चिकित्सकों की सूक्ष्म तकनीक, अनुभव और धैर्यपूर्ण प्रयासों के परिणामस्वरूप मरीज की गर्दन की गंभीर चोट को सफलतापूर्वक ठीक कर दिया गया।

सर्जरी के पश्चात की गई जांचों में मरीज के सिर की हड्डी में कई स्थानों पर फ्रैक्चर तथा सीटी स्कैन में मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव (इंट्राक्रेनियल हेमरेज) के संकेत मिले। सिम्स में न्यूरोसर्जन उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीज को प्राथमिक रूप से स्थिर करने के बाद आगे के उपचार हेतु पंडित जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल, रायपुर रेफर किया गया, जहां उसका उपचार जारी है।

इस जटिल एवं जीवनरक्षक सर्जरी को सफल बनाने में एनेस्थीसिया विभाग की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. मधुमिता मूर्ति तथा सहायक प्राध्यापक डॉ. प्रशांत कुमार पैंकरा के नेतृत्व में एनेस्थीसिया टीम ने पूरे ऑपरेशन के दौरान मरीज की स्थिति को नियंत्रित एवं सुरक्षित बनाए रखा। ईएनटी, सर्जरी एवं एनेस्थीसिया विभागों के बेहतर समन्वय ने इस चुनौतीपूर्ण मामले को सफलता में बदल दिया।

ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. आरती पाण्डेय ने बताया कि मरीज जब अस्पताल पहुंचा तब उसकी स्थिति अत्यंत गंभीर थी। सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने इस सफलता पर चिकित्सकों की टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह मामला सिम्स के चिकित्सकों की दक्षता, समर्पण और त्वरित निर्णय क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि गंभीर एवं जटिल परिस्थितियों में समय पर दिया गया उपचार मरीज के जीवन को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सिम्स लगातार आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं एवं विशेषज्ञ सेवाओं के माध्यम से प्रदेशवासियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहा है।


रायपुर, 2 जून 2026/ छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) बिलासपुर के चिकित्सकों ने अपनी विशेषज्ञता, त्वरित निर्णय क्षमता एवं उत्कृष्ट टीमवर्क का परिचय देते हुए एक 26 वर्षीय युवक की जान बचाने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। गले में गंभीर एवं जानलेवा चोट के साथ अस्पताल पहुंचे युवक का आपातकालीन ऑपरेशन कर न केवल उसकी सांसों को सुरक्षित किया गया, बल्कि क्षतिग्रस्त श्वासनली की सफल मरम्मत भी की गई। चिकित्सकों की इस उपलब्धि ने एक बार फिर सिम्स की आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की दक्षता को सिद्ध किया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शादाब खान (26 वर्ष) को गंभीर अवस्था में सिम्स के कैजुअल्टी विभाग में लाया गया। मरीज के गले में गहरा खुला घाव था तथा श्वासनली कट जाने के कारण सांस लेने की प्रक्रिया बाधित हो चुकी थी। घाव से हवा का स्पष्ट आवागमन हो रहा था, जो चिकित्सकीय दृष्टि से अत्यंत गंभीर स्थिति थी। चिकित्सा विज्ञान में इस प्रकार की चोट को लैरिंगोट्रेकियल इंजरी (Laryngotracheal Injury) कहा जाता है।

मरीज के शरीर में ऑक्सीजन का स्तर लगातार गिर रहा था और उसकी स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई थी। ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. आरती पाण्डेय, सह प्राध्यापक  विद्याभूषण साहू सहायक प्राध्यापक डॉ. श्वेता मित्तल ने तत्काल स्थिति का आकलन कर मरीज को आपातकालीन ऑपरेशन थिएटर ले जाने का निर्णय लिया। चिकित्सकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मरीज के श्वास मार्ग को सुरक्षित करना था, क्योंकि थोड़ी सी भी देरी जानलेवा साबित हो सकती थी।

ऑपरेशन थिएटर में पहुंचते ही चिकित्सकों ने आपातकालीन ट्रेकियोस्टॉमी कर मरीज का श्वास मार्ग सुरक्षित किया और ऑक्सीजन संतृप्ति को सामान्य स्तर पर लाया गया। इसके बाद शुरू हुई अत्यंत जटिल एवं चुनौतीपूर्ण सर्जरी, जिसमें श्वासनली की मरम्मत के साथ गर्दन की अन्य क्षतिग्रस्त संरचनाओं को भी पुनर्स्थापित किया गया।

लगभग दो घंटे तक चली इस सर्जरी में श्वासनली, उसके ऊपर की मांसपेशियों, फैशियल लेयर तथा त्वचा को क्रमशः पांच परतों में जोड़कर मरम्मत की गई। चिकित्सकों की सूक्ष्म तकनीक, अनुभव और धैर्यपूर्ण प्रयासों के परिणामस्वरूप मरीज की गर्दन की गंभीर चोट को सफलतापूर्वक ठीक कर दिया गया।

सर्जरी के पश्चात की गई जांचों में मरीज के सिर की हड्डी में कई स्थानों पर फ्रैक्चर तथा सीटी स्कैन में मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव (इंट्राक्रेनियल हेमरेज) के संकेत मिले। सिम्स में न्यूरोसर्जन उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीज को प्राथमिक रूप से स्थिर करने के बाद आगे के उपचार हेतु पंडित जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल, रायपुर रेफर किया गया, जहां उसका उपचार जारी है।

इस जटिल एवं जीवनरक्षक सर्जरी को सफल बनाने में एनेस्थीसिया विभाग की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. मधुमिता मूर्ति तथा सहायक प्राध्यापक डॉ. प्रशांत कुमार पैंकरा के नेतृत्व में एनेस्थीसिया टीम ने पूरे ऑपरेशन के दौरान मरीज की स्थिति को नियंत्रित एवं सुरक्षित बनाए रखा। ईएनटी, सर्जरी एवं एनेस्थीसिया विभागों के बेहतर समन्वय ने इस चुनौतीपूर्ण मामले को सफलता में बदल दिया।

ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. आरती पाण्डेय ने बताया कि मरीज जब अस्पताल पहुंचा तब उसकी स्थिति अत्यंत गंभीर थी। सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने इस सफलता पर चिकित्सकों की टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह मामला सिम्स के चिकित्सकों की दक्षता, समर्पण और त्वरित निर्णय क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि गंभीर एवं जटिल परिस्थितियों में समय पर दिया गया उपचार मरीज के जीवन को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सिम्स लगातार आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं एवं विशेषज्ञ सेवाओं के माध्यम से प्रदेशवासियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहा है।


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