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PIB Raipur News :: जेएलएनएचआरसी की पहल से 100 नर्सिंग कर्मी प्रशिक्षित, स्तनपान प्रबंधन पर राज्य स्तरीय कार्यशाला:

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khabrilalवैज्ञानिक जानकारी और प्रभावी परामर्श से मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर जोर।

छत्तीसगढ़ में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र (जेएलएनएचआरसी), भिलाई ने स्पर्श मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के सहयोग से राज्य स्तरीय ‘स्तनपान एवं लैक्टेशन प्रबंधन कार्यशाला’ का आयोजन किया। कार्यशाला में करीब 100 नर्सिंग विद्यार्थियों एवं नर्सिंग कर्मियों को स्तनपान के वैज्ञानिक पहलुओं, व्यावहारिक प्रबंधन तथा माताओं को प्रभावी परामर्श एवं सहयोग देने के लिए प्रशिक्षित किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुख्य चिकित्सा अधिकारी (चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं) डॉ. उदय कुमार ने कहा कि लैक्टेशन प्रबंधन पर केंद्रित प्रशिक्षण कार्यशालाएं स्वास्थ्यकर्मियों के ज्ञान एवं दक्षता को बढ़ाने के साथ माताओं को सशक्त बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक जानकारी और उचित परामर्श के माध्यम से स्तनपान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर किया जा सकता है। इससे दस्त, निमोनिया और कुपोषण जैसी स्थितियों से होने वाली शिशु मृत्यु दर को कम करने में भी सहायता मिल सकती है।

उन्होंने कहा कि यह पहल भारत सरकार के ‘मातृ स्नेह की पूर्णता’ यानी मदर्स एब्सोल्यूट अफेक्शन (एमएए) कार्यक्रम तथा पोषण अभियान के उद्देश्यों के अनुरूप है। इन पहलों के तहत नवजात शिशु को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने और जीवन के पहले छह माह तक केवल मां का दूध देने को प्रोत्साहित किया जाता है।

कार्यशाला के तकनीकी सत्रों का संचालन मुख्य सलाहकार (शिशु एवं बाल रोग) डॉ. माला चौधरी ने किया। उन्होंने बेबी-फ्रेंडली हॉस्पिटल इनिशिएटिव (बीएफएचआई) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की इस वैश्विक पहल का उद्देश्य अस्पतालों में स्तनपान को बढ़ावा देना, उसका संरक्षण करना तथा माताओं को प्रभावी सहयोग एवं परामर्श उपलब्ध कराना है। उन्होंने बताया कि इस पहल के तहत अस्पतालों में ‘सफल स्तनपान के लिए 10 कदम’ प्रभावी रूप से लागू किए जाते हैं। जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र, भिलाई को बेबी-फ्रेंडली हॉस्पिटल इनिशिएटिव के तहत प्रमाणन प्राप्त है।

स्पर्श मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार (शिशु रोग) डॉ. अरविंद पी. सावंत और अधीक्षक डॉ. संजय गोयल ने प्रतिभागियों को शिशु को सही तरीके से स्तन से लगाने की तकनीक, स्तनपान से जुड़ी सामान्य चुनौतियों के प्रबंधन तथा नई माताओं को प्रभावी परामर्श देने के व्यावहारिक पहलुओं का प्रशिक्षण दिया।

एक दिवसीय कार्यशाला में विशेषज्ञ व्याख्यान के साथ संवादात्मक केस डिस्कशन, पोस्टर प्रतियोगिता और ज्ञानवर्धक क्विज का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण को व्यावहारिक एवं सहभागी स्वरूप देते हुए प्रतिभागियों के सैद्धांतिक ज्ञान को व्यवहारिक कौशल में बदलने पर जोर दिया गया, ताकि वे प्रसव के बाद माताओं और नवजात शिशुओं को स्तनपान के लिए आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रभावी ढंग से उपलब्ध करा सकें।

विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ में करीब 49 प्रतिशत नवजात शिशुओं को जन्म के एक घंटे के भीतर मां का दूध मिल पाता है, जबकि केवल 25 प्रतिशत शिशुओं को छह माह तक विशेष स्तनपान कराया जाता है। इन आंकड़ों के मद्देनजर नर्सिंग कर्मियों की क्षमता और दक्षता बढ़ाना कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य रहा। कार्यशाला का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि प्रत्येक मां को स्तनपान के लिए उचित सहयोग, मार्गदर्शन और परामर्श उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे स्वस्थ समाज और स्वस्थ भारत के निर्माण में योगदान दिया जा सके।



khabrilalवैज्ञानिक जानकारी और प्रभावी परामर्श से मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर जोर।

छत्तीसगढ़ में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र (जेएलएनएचआरसी), भिलाई ने स्पर्श मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के सहयोग से राज्य स्तरीय ‘स्तनपान एवं लैक्टेशन प्रबंधन कार्यशाला’ का आयोजन किया। कार्यशाला में करीब 100 नर्सिंग विद्यार्थियों एवं नर्सिंग कर्मियों को स्तनपान के वैज्ञानिक पहलुओं, व्यावहारिक प्रबंधन तथा माताओं को प्रभावी परामर्श एवं सहयोग देने के लिए प्रशिक्षित किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुख्य चिकित्सा अधिकारी (चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं) डॉ. उदय कुमार ने कहा कि लैक्टेशन प्रबंधन पर केंद्रित प्रशिक्षण कार्यशालाएं स्वास्थ्यकर्मियों के ज्ञान एवं दक्षता को बढ़ाने के साथ माताओं को सशक्त बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक जानकारी और उचित परामर्श के माध्यम से स्तनपान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर किया जा सकता है। इससे दस्त, निमोनिया और कुपोषण जैसी स्थितियों से होने वाली शिशु मृत्यु दर को कम करने में भी सहायता मिल सकती है।

उन्होंने कहा कि यह पहल भारत सरकार के ‘मातृ स्नेह की पूर्णता’ यानी मदर्स एब्सोल्यूट अफेक्शन (एमएए) कार्यक्रम तथा पोषण अभियान के उद्देश्यों के अनुरूप है। इन पहलों के तहत नवजात शिशु को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने और जीवन के पहले छह माह तक केवल मां का दूध देने को प्रोत्साहित किया जाता है।

कार्यशाला के तकनीकी सत्रों का संचालन मुख्य सलाहकार (शिशु एवं बाल रोग) डॉ. माला चौधरी ने किया। उन्होंने बेबी-फ्रेंडली हॉस्पिटल इनिशिएटिव (बीएफएचआई) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की इस वैश्विक पहल का उद्देश्य अस्पतालों में स्तनपान को बढ़ावा देना, उसका संरक्षण करना तथा माताओं को प्रभावी सहयोग एवं परामर्श उपलब्ध कराना है। उन्होंने बताया कि इस पहल के तहत अस्पतालों में ‘सफल स्तनपान के लिए 10 कदम’ प्रभावी रूप से लागू किए जाते हैं। जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केंद्र, भिलाई को बेबी-फ्रेंडली हॉस्पिटल इनिशिएटिव के तहत प्रमाणन प्राप्त है।

स्पर्श मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार (शिशु रोग) डॉ. अरविंद पी. सावंत और अधीक्षक डॉ. संजय गोयल ने प्रतिभागियों को शिशु को सही तरीके से स्तन से लगाने की तकनीक, स्तनपान से जुड़ी सामान्य चुनौतियों के प्रबंधन तथा नई माताओं को प्रभावी परामर्श देने के व्यावहारिक पहलुओं का प्रशिक्षण दिया।

एक दिवसीय कार्यशाला में विशेषज्ञ व्याख्यान के साथ संवादात्मक केस डिस्कशन, पोस्टर प्रतियोगिता और ज्ञानवर्धक क्विज का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण को व्यावहारिक एवं सहभागी स्वरूप देते हुए प्रतिभागियों के सैद्धांतिक ज्ञान को व्यवहारिक कौशल में बदलने पर जोर दिया गया, ताकि वे प्रसव के बाद माताओं और नवजात शिशुओं को स्तनपान के लिए आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रभावी ढंग से उपलब्ध करा सकें।

विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ में करीब 49 प्रतिशत नवजात शिशुओं को जन्म के एक घंटे के भीतर मां का दूध मिल पाता है, जबकि केवल 25 प्रतिशत शिशुओं को छह माह तक विशेष स्तनपान कराया जाता है। इन आंकड़ों के मद्देनजर नर्सिंग कर्मियों की क्षमता और दक्षता बढ़ाना कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य रहा। कार्यशाला का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि प्रत्येक मां को स्तनपान के लिए उचित सहयोग, मार्गदर्शन और परामर्श उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे स्वस्थ समाज और स्वस्थ भारत के निर्माण में योगदान दिया जा सके।


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