कैलाश पर्वत से अपने चारों बच्चों संग धरती पर आती हैं माँ दुर्गा, श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू होता है शक्ति की आराधना का पर्व।
रायपुर। महालया केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि श्रद्धा, आस्था और भावनाओं का अद्भुत संगम है। पितृ पक्ष की अमावस्या के साथ पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने का पावन काल समाप्त होता है और देवी पक्ष का शुभारंभ होता है। एक ओर श्रद्धालु पवित्र नदियों और जलाशयों के किनारे अपने पितरों की आत्मशांति के लिए पिंडदान एवं तर्पण करते हैं, वहीं दूसरी ओर माँ दुर्गा के आगमन की कल्पना से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
बंगाल की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में महालया का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इसी पावन बेला में माँ दुर्गा अपने मायके अर्थात पृथ्वी लोक की ओर प्रस्थान करती हैं। कैलाश पर्वत से माता अपने बच्चों—माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, भगवान कार्तिकेय और विघ्नहर्ता गणेश के साथ धरती पर आती हैं। यह दृश्य माँ के अपने बच्चों सहित मायके लौटने की भावनात्मक अनुभूति कराता है।
माँ के स्वागत में ढाक की गूंज, शंखनाद, उलुध्वनि और भक्तों के जयकारों से वातावरण उत्सवमय हो उठता है। घरों में उल्लास, चेहरों पर मुस्कान और हृदय में भक्ति का संचार होने लगता है। बंगाली समाज में महालया की सुबह महिषासुरमर्दिनी के पारंपरिक पाठ एवं देवी स्तुति का श्रवण विशेष महत्व रखता है।
महालया हमें जीवन का एक गहरा संदेश भी देता है। पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता सिखाता है, जबकि देवी पक्ष नई ऊर्जा, साहस, शक्ति और सकारात्मकता का प्रतीक है। एक ओर पितरों को श्रद्धापूर्वक विदाई, दूसरी ओर जगतजननी माँ दुर्गा के स्वागत की तैयारी—यही महालया की अनुपम सुंदरता है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
कैलाश पर्वत से अपने चारों बच्चों संग धरती पर आती हैं माँ दुर्गा, श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू होता है शक्ति की आराधना का पर्व।
रायपुर। महालया केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि श्रद्धा, आस्था और भावनाओं का अद्भुत संगम है। पितृ पक्ष की अमावस्या के साथ पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने का पावन काल समाप्त होता है और देवी पक्ष का शुभारंभ होता है। एक ओर श्रद्धालु पवित्र नदियों और जलाशयों के किनारे अपने पितरों की आत्मशांति के लिए पिंडदान एवं तर्पण करते हैं, वहीं दूसरी ओर माँ दुर्गा के आगमन की कल्पना से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
बंगाल की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में महालया का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इसी पावन बेला में माँ दुर्गा अपने मायके अर्थात पृथ्वी लोक की ओर प्रस्थान करती हैं। कैलाश पर्वत से माता अपने बच्चों—माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, भगवान कार्तिकेय और विघ्नहर्ता गणेश के साथ धरती पर आती हैं। यह दृश्य माँ के अपने बच्चों सहित मायके लौटने की भावनात्मक अनुभूति कराता है।
माँ के स्वागत में ढाक की गूंज, शंखनाद, उलुध्वनि और भक्तों के जयकारों से वातावरण उत्सवमय हो उठता है। घरों में उल्लास, चेहरों पर मुस्कान और हृदय में भक्ति का संचार होने लगता है। बंगाली समाज में महालया की सुबह महिषासुरमर्दिनी के पारंपरिक पाठ एवं देवी स्तुति का श्रवण विशेष महत्व रखता है।
महालया हमें जीवन का एक गहरा संदेश भी देता है। पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता सिखाता है, जबकि देवी पक्ष नई ऊर्जा, साहस, शक्ति और सकारात्मकता का प्रतीक है। एक ओर पितरों को श्रद्धापूर्वक विदाई, दूसरी ओर जगतजननी माँ दुर्गा के स्वागत की तैयारी—यही महालया की अनुपम सुंदरता है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥


Journalist खबरीलाल














