नयी दिल्ली. उत्तर प्रदेश में पिछले तीन दशकों
में
सामाजिक न्याय और मंडल की राजनीति के वर्चस्व के बावजूद विधानसभा में पिछड़ी
एवं अति पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में आज भी
बहुत कम है। एक नई किताब में दावा किया गया है कि देश के सबसे बड़े राज्य
में पहले विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक विधानसभा के प्रतिनिधित्व में सवर्ण
जातियों का ही दबदबा बना हुआ है तथा पिछड़े वर्ग, प्रतिनिधित्व के मापदंड
पर अब भी पिछड़े हुए हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव की किताब ‘उत्तर
प्रदेश चुनाव 2022:
जातियों का पुनर्ध्रुवीकरण’ में पिछले कुछ चुनावों में विभिन्न दलों, खासकर
सत्ता में आए राजनीतिक दलों की ओर से टिकटों में पिछड़ी जातियों और सवर्ण
जातियों को दी गई हिस्सेदारी पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। पुस्तक में
कहा गया है, ‘‘पिछले 70 वर्षों में सामाजिक न्याय को लेकर
तकरीबन हर पार्टी की तमाम नारेबाजी और संवैधानिक उपायों के बावजूद आबादी के
अनुपात के अनुसार राजनीतिक हिस्सेदारी का नारा महज एक नारा ही बनकर रह
गया।’’ उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए
पुस्तक में कहा गया है, ‘‘2017 के विधानसभा चुनाव के बाद 403 विधायकों में
से 44.3 प्रतिशत विधायक अगड़ी जातियों के थे। सदन में अगड़ी जातियों की यह
हिस्सेदारी 1980 के बाद सबसे अधिक थी। 2012 के चुनाव की तुलना में पिछले
चुनाव में अगड़ी जातियों के विधायक 12 प्रतिशत अधिक थे।’’
इसके मुताबिक,
2017 के विधानसभा चुनाव के बाद पिछड़ों का प्रतिनिधित्व
25.6 प्रतिशत था, हालांकि 2012 के विधानसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग के सिर्फ
27 प्रतिशत लोग ही विधानसभा पहुंचे थे। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्र भारत में
अब तक जाति आधारित जनगणना नहीं हुई है, लेकिन अलग-अलग अनुमानों में यह कहा
जाता रहा है कि उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और अति पिछड़ों की आबादी 40 प्रतिशत
से अधिक है। पुस्तक में इसका उल्लेख किया गया है कि पिछले विधानसभा चुनाव
के बाद
सत्ता में आई भाजपा ने 48.6 प्रतिशत टिकट अगड़ी जाति के लोगों को दिया और
उसके कुल निर्वाचित विधायकों में सवर्ण विधायकों की हिस्सेदारी 48.2
प्रतिशत रही। इसके अनुसार, भाजपा ने पिछड़ों को 24.4 प्रतिशत टिकट दिया था
और इसमें सबसे अधिक आठ प्रतिशत टिकट कुर्मी समुदाय के लोगों को मिले थे।
पुस्तक में लिखा गया है, ‘‘1990 में जो परिवर्तन हुए, जिनसे राजनीतिक
उथल-पुथल शुरू हुई थी, वह प्रक्रिया अब भी जारी है।’’ लेखक ने इस पुस्तक
में उत्तर प्रदेश में आबादी के हिसाब से असरदार मानी जाने वाली कुछ जातियों
पर आधारित पार्टियों के वजूद और उनकी अहमियत का भी उल्लेख किया है। पुस्तक
में अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, पीस पार्टी और निषाद
पार्टी के बारे में भी प्रकाश डाला गया है। ये पार्टियां 2022 के विधानसभा
चुनाव में प्रमुख गठबंधनों का हिस्सा हैं।
नयी दिल्ली. उत्तर प्रदेश में पिछले तीन दशकों
में
सामाजिक न्याय और मंडल की राजनीति के वर्चस्व के बावजूद विधानसभा में पिछड़ी
एवं अति पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में आज भी
बहुत कम है। एक नई किताब में दावा किया गया है कि देश के सबसे बड़े राज्य
में पहले विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक विधानसभा के प्रतिनिधित्व में सवर्ण
जातियों का ही दबदबा बना हुआ है तथा पिछड़े वर्ग, प्रतिनिधित्व के मापदंड
पर अब भी पिछड़े हुए हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव की किताब ‘उत्तर
प्रदेश चुनाव 2022:
जातियों का पुनर्ध्रुवीकरण’ में पिछले कुछ चुनावों में विभिन्न दलों, खासकर
सत्ता में आए राजनीतिक दलों की ओर से टिकटों में पिछड़ी जातियों और सवर्ण
जातियों को दी गई हिस्सेदारी पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। पुस्तक में
कहा गया है, ‘‘पिछले 70 वर्षों में सामाजिक न्याय को लेकर
तकरीबन हर पार्टी की तमाम नारेबाजी और संवैधानिक उपायों के बावजूद आबादी के
अनुपात के अनुसार राजनीतिक हिस्सेदारी का नारा महज एक नारा ही बनकर रह
गया।’’ उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए
पुस्तक में कहा गया है, ‘‘2017 के विधानसभा चुनाव के बाद 403 विधायकों में
से 44.3 प्रतिशत विधायक अगड़ी जातियों के थे। सदन में अगड़ी जातियों की यह
हिस्सेदारी 1980 के बाद सबसे अधिक थी। 2012 के चुनाव की तुलना में पिछले
चुनाव में अगड़ी जातियों के विधायक 12 प्रतिशत अधिक थे।’’
इसके मुताबिक,
2017 के विधानसभा चुनाव के बाद पिछड़ों का प्रतिनिधित्व
25.6 प्रतिशत था, हालांकि 2012 के विधानसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग के सिर्फ
27 प्रतिशत लोग ही विधानसभा पहुंचे थे। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्र भारत में
अब तक जाति आधारित जनगणना नहीं हुई है, लेकिन अलग-अलग अनुमानों में यह कहा
जाता रहा है कि उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और अति पिछड़ों की आबादी 40 प्रतिशत
से अधिक है। पुस्तक में इसका उल्लेख किया गया है कि पिछले विधानसभा चुनाव
के बाद
सत्ता में आई भाजपा ने 48.6 प्रतिशत टिकट अगड़ी जाति के लोगों को दिया और
उसके कुल निर्वाचित विधायकों में सवर्ण विधायकों की हिस्सेदारी 48.2
प्रतिशत रही। इसके अनुसार, भाजपा ने पिछड़ों को 24.4 प्रतिशत टिकट दिया था
और इसमें सबसे अधिक आठ प्रतिशत टिकट कुर्मी समुदाय के लोगों को मिले थे।
पुस्तक में लिखा गया है, ‘‘1990 में जो परिवर्तन हुए, जिनसे राजनीतिक
उथल-पुथल शुरू हुई थी, वह प्रक्रिया अब भी जारी है।’’ लेखक ने इस पुस्तक
में उत्तर प्रदेश में आबादी के हिसाब से असरदार मानी जाने वाली कुछ जातियों
पर आधारित पार्टियों के वजूद और उनकी अहमियत का भी उल्लेख किया है। पुस्तक
में अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, पीस पार्टी और निषाद
पार्टी के बारे में भी प्रकाश डाला गया है। ये पार्टियां 2022 के विधानसभा
चुनाव में प्रमुख गठबंधनों का हिस्सा हैं।



Journalist खबरीलाल














