संवाददाता/सौरभ साहू कि विशेष रिपोर्ट।
सूरजपुर। दिनांक 07 मई 2026। जिले के चौक-चौराहों पर इन दिनों एक ऐसी तस्वीर आम हो चुकी है, जो विकास और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है। गोद में मासूम बच्चों को लिए महिलाएं सड़कों पर भीख मांगते दिखाई देती हैं। यह केवल गरीबी नहीं, बल्कि टूटती पारंपरिक आजीविका, बेरोजगारी और प्रशासनिक उदासीनता की दर्दनाक कहानी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह स्थिति उस जिले में देखने को मिल रही है।
सूरजपुर जिले के विभिन्न विकासखंडों के भीड़भाड़ वाले इलाकों में छोटे बच्चे और महिलाएं खुलेआम भिक्षावृत्ति करते देखे जा सकते हैं। जिला मुख्यालय के प्रमुख चौक-चौराहों पर भी कई महिलाएं अपने नन्हे बच्चों को गोद में लेकर राहगीरों से मदद मांगती नजर आती हैं। यह दृश्य न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोरता है, बल्कि प्रशासनिक दावों की वास्तविकता भी सामने लाता है। ऐसी ही एक महिला से बातचीत के दौरान उसकी मजबूरी छलक उठी। महिला ने बताया कि वह प्रतिदिन सुबह घर से निकलकर भीख मांगने का काम करती है। वह भैयाथान विकासखंड के ग्राम समोली की रहने वाली है और बसोर समाज से संबंध रखती है। महिला ने बताया कि उनके पूर्वज कभी बांस के कुशल कारीगर हुआ करते थे। बांस से घरेलू उपयोग की कई वस्तुएं बनाकर परिवार का पालन-पोषण होता था। लेकिन समय के साथ प्लास्टिक और आधुनिक सामानों ने बाजार पर कब्जा जमा लिया। धीरे-धीरे बांस के सामानों की मांग खत्म होती चली गई और उनके परिवार का पारंपरिक रोजगार भी छिन गया।
महिला ने कहा कि रोजगार के अभाव में अब उनके सामने भीख मांगने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने यह भी बताया कि लंबे समय से इसी जीवनशैली में रहने के कारण अब वे ज्यादा मेहनत वाला काम भी लगातार नहीं कर पातीं। सबसे अधिक पीड़ादायक स्थिति उन मासूम बच्चों की है, जो स्कूल और खेल के मैदान की जगह सड़कों और ट्रैफिक सिग्नलों के बीच अपना बचपन गुजारने को मजबूर हैं। सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन गंभीर पहल करे तो ऐसे परिवारों को रोजगार योजनाओं, कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास से जोड़कर मुख्यधारा में लाया जा सकता है। फिलहाल सूरजपुर की सड़कों पर फैले ये दृश्य यह बताने के लिए काफी हैं कि विकास की चमक के पीछे आज भी कई परिवार दो वक्त की रोटी और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
संवाददाता/सौरभ साहू कि विशेष रिपोर्ट।
सूरजपुर। दिनांक 07 मई 2026। जिले के चौक-चौराहों पर इन दिनों एक ऐसी तस्वीर आम हो चुकी है, जो विकास और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है। गोद में मासूम बच्चों को लिए महिलाएं सड़कों पर भीख मांगते दिखाई देती हैं। यह केवल गरीबी नहीं, बल्कि टूटती पारंपरिक आजीविका, बेरोजगारी और प्रशासनिक उदासीनता की दर्दनाक कहानी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह स्थिति उस जिले में देखने को मिल रही है।
सूरजपुर जिले के विभिन्न विकासखंडों के भीड़भाड़ वाले इलाकों में छोटे बच्चे और महिलाएं खुलेआम भिक्षावृत्ति करते देखे जा सकते हैं। जिला मुख्यालय के प्रमुख चौक-चौराहों पर भी कई महिलाएं अपने नन्हे बच्चों को गोद में लेकर राहगीरों से मदद मांगती नजर आती हैं। यह दृश्य न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोरता है, बल्कि प्रशासनिक दावों की वास्तविकता भी सामने लाता है। ऐसी ही एक महिला से बातचीत के दौरान उसकी मजबूरी छलक उठी। महिला ने बताया कि वह प्रतिदिन सुबह घर से निकलकर भीख मांगने का काम करती है। वह भैयाथान विकासखंड के ग्राम समोली की रहने वाली है और बसोर समाज से संबंध रखती है। महिला ने बताया कि उनके पूर्वज कभी बांस के कुशल कारीगर हुआ करते थे। बांस से घरेलू उपयोग की कई वस्तुएं बनाकर परिवार का पालन-पोषण होता था। लेकिन समय के साथ प्लास्टिक और आधुनिक सामानों ने बाजार पर कब्जा जमा लिया। धीरे-धीरे बांस के सामानों की मांग खत्म होती चली गई और उनके परिवार का पारंपरिक रोजगार भी छिन गया।
महिला ने कहा कि रोजगार के अभाव में अब उनके सामने भीख मांगने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने यह भी बताया कि लंबे समय से इसी जीवनशैली में रहने के कारण अब वे ज्यादा मेहनत वाला काम भी लगातार नहीं कर पातीं। सबसे अधिक पीड़ादायक स्थिति उन मासूम बच्चों की है, जो स्कूल और खेल के मैदान की जगह सड़कों और ट्रैफिक सिग्नलों के बीच अपना बचपन गुजारने को मजबूर हैं। सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन गंभीर पहल करे तो ऐसे परिवारों को रोजगार योजनाओं, कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास से जोड़कर मुख्यधारा में लाया जा सकता है। फिलहाल सूरजपुर की सड़कों पर फैले ये दृश्य यह बताने के लिए काफी हैं कि विकास की चमक के पीछे आज भी कई परिवार दो वक्त की रोटी और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।



Journalist खबरीलाल














