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Raipur (खबरीलाल न्यूज़) :: विष्णुदेव सरकार का मंत्रियों-विधायकों को कड़ा संदेश, "फैक्ट्स के साथ उतरें, विपक्ष को बैकफुट पर लाएं":

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khabrilalरायपुर। विष्णुदेव सरकार इन दिनों विपक्ष से खौफ खा रही है, तो छत्तीसगढ़ की राजनीति इस समय पूरी तरह गर्माई हुई है। 13 जुलाई से शुरू होने जा रहा विधानसभा का मानसून सत्र इस बार सिर्फ एक विधायी औपचारिकता भर नहीं होने वाला, बल्कि यह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक हाई-वोल्टेज सियासी दंगल में बदलने जा रहा है। नवा रायपुर में हुई विष्णुदेव साय सरकार की मैराथन बैठक के बाद यह साफ हो चुका है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) रक्षात्मक मुद्रा में रहने के मूड में बिल्कुल नहीं है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री अरुण साव की मौजूदगी में हुई इस बैठक में मंत्रियों और विधायकों को जो ‘स्पेशल होमवर्क’ दिया गया है, उसने यह साफ कर दिया है कि सदन के भीतर इस बार का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है।

सदन में सिर्फ हाजिरी नहीं, आंकड़ों की धमक चाहिए

नवा रायपुर में जब भाजपा विधायक दल की बैठक शुरू हुई, तो एजेंडा सिर्फ सत्र की तारीखें तय करना नहीं था। नेतृत्व की तरफ से सभी विधायकों और मंत्रियों को बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया गया कि सदन में आपकी सिर्फ शारीरिक मौजूदगी काफी नहीं है। इस बार आपको पूरी तैयारी, सटीक आंकड़ों और अपने क्षेत्र की जमीनी हकीकत की फाइलों के साथ उतरना होगा।

पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि विपक्ष इस बार सरकार को घेरने के लिए पूरी ताकत झोंकने की फिराक में है। ऐसे में किसी भी मंत्री या विधायक की एक छोटी सी ढिलाई या अधूरी जानकारी पूरी सरकार को असहज कर सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए हर विधायक को उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ा एक विशेष ‘टास्क’ सौंप दिया गया है।

विधायकों को सख्त निर्देश दिया गया है कि वे अपने क्षेत्र में चल रही विकास योजनाओं, केंद्र और राज्य सरकार की फ्लैगशिप स्कीम्स के क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर जनता को मिल रहे लाभ का पूरा डेटा अपनी जुबान पर रखें। अगर विपक्ष किसी भी क्षेत्र विशेष को लेकर सवाल उठाता है, तो सत्ता पक्ष का विधायक केवल राजनीतिक भाषण नहीं देगा, बल्कि वह आधिकारिक आंकड़ों और तथ्यों के साथ पलटवार करेगा ताकि विपक्ष के आरोपों की हवा निकाली जा सके।

‘नकटी एनक्रोचमेंट’ और ‘बुलडोजर एक्शन’ :

इस मानसून सत्र में जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा तकरार होने की उम्मीद है, वह है रायपुर का ‘नकटी गांव मामला’। नकटी गांव में हाल ही में प्रशासन द्वारा की गई अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई, वहां से लोगों का विस्थापन और विधायक आवास के लिए प्रस्तावित भूमि को लेकर उठा विवाद इस समय छत्तीसगढ़ की राजनीति का सबसे हॉट टॉपिक बना हुआ है।हैरानी की बात यह है कि इस मुद्दे पर केवल विपक्ष ही हमलावर नहीं है, बल्कि भाजपा के ही एक सांसद द्वारा इस कार्रवाई पर सवाल उठाए जाने के बाद से सरकार के भीतर और बाहर का माहौल बेहद संवेदनशील हो गया है। कांग्रेस इस मामले को ‘गरीब विरोधी’ और ‘प्रशासनिक तानाशाही’ का रूप देकर सदन में सरकार की घेराबंदी करने की पूरी तैयारी कर चुकी है।

विधायक दल की बैठक में नकटी मामले पर विशेष रूप से मंथन हुआ। मंत्रियों को स्पष्ट हिदायत दी गई है कि इस मामले में प्रशासनिक नियमों, भू-आवंटन के कानूनी पहलुओं और विस्थापितों के लिए किए गए पुनर्वास के प्रयासों को पूरी पारदर्शिता के साथ सदन के पटल पर रखा जाए। सरकार इस मुद्दे पर बैकफुट पर जाने के बजाय इसे ‘नियम और कानून के राज’ के रूप में पेश करने की रणनीति बना रही है।

इन 5 कोर मुद्दों पर कांग्रेस करेगी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’, भाजपा ने तैयार की ‘शील्ड’ - 13 से 17 जुलाई तक चलने वाले इस 5 दिवसीय संक्षिप्त लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सत्र में कांग्रेस ने सरकार को घेरने के लिए जिन 5 मुख्य मोर्चों को चुना है, सत्ता पक्ष ने उनकी काट पहले से ही तैयार कर ली है।

पहला मोर्चा (कानून-व्यवस्था): प्रदेश की हालिया आपराधिक घटनाओं को लेकर विपक्ष आक्रामक रुख अपनाएगा। इसके जवाब में सरकार पिछले शासनकाल (कांग्रेस राज) के क्राइम ग्राफ के तुलनात्मक आंकड़े पेश कर कांग्रेस को आईना दिखाने की तैयारी में है।

दूसरा मोर्चा (नकटी बुलडोजर कार्रवाई): विस्थापन और प्रशासनिक मनमानी के आरोपों का सामना करने के लिए सरकार नियमों के तहत की गई कार्रवाई और पुनर्वास के ठोस तथ्यों को सामने रखेगी।

तीसरा मोर्चा (किसान और कृषि): खाद-बीज की उपलब्धता और बोनस वितरण के मुद्दों पर विपक्ष के वार को बेकार करने के लिए ‘कृषि उन्नति योजना’ के तहत किसानों के खातों में ट्रांसफर की गई राशि का पूरा ब्यौरा तैयार रखा गया है।

चौथा मोर्चा (आदिवासी क्षेत्रों में विकास): बस्तर और सरगुजा के स्थानीय मुद्दों पर विपक्ष को शांत करने के लिए साय सरकार द्वारा आदिवासी कल्याण के लिए शुरू की गई नई योजनाओं का आक्रामक प्रचार किया जाएगा।

पांचवां मोर्चा (बुनियादी सुविधाएं): सड़क, बिजली और पानी की स्थिति पर उठने वाले सवालों के जवाब में बजट आवंटन और प्रगतिरत परियोजनाओं की वास्तविक ‘स्टेटस रिपोर्ट’ सदन में रखी जाएगी।

‘वन वॉइस’ पॉलिसी : इस बैठक की एक और बेहद महत्वपूर्ण बात जो छनकर सामने आई है, वह है ‘वन वॉइस’ (एक सुर) की नीति। पार्टी नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि सदन के भीतर या बाहर, किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर अलग-अलग मंत्रियों या विधायकों के बयानों में विरोधाभास नहीं दिखना चाहिए।

अक्सर देखा जाता है कि सदन के भीतर विपक्ष के तीखे सवालों के आगे कुछ विधायक भावनाओं में बहकर या अधूरी जानकारी के कारण ऐसा बयान दे देते हैं जिससे पूरी पार्टी और सरकार की किरकिरी हो जाती है। इस बार इसे रोकने के लिए सख्त गाइडलाइंस दी गई हैं। मंत्रियों और उनके विभागों से जुड़े विधायकों के बीच लगातार समन्वय रहेगा। इसके साथ ही, सदन की कार्यवाही के दौरान या बाद में जब भी मीडिया से बातचीत हो, तो केवल आधिकारिक तौर पर तय की गई ‘लाइन’ पर ही बात की जाए। बिना तथ्यों के किसी भी विषय पर कयास लगाने वाले बयानों से बचने को कहा गया है।

बैठक से दिग्गजों की दूरी - इस हाई-प्रोफाइल बैठक में जहां एक तरफ पूरी सरकार और संगठन सत्र को सफल बनाने के लिए सिर जोड़कर बैठा था, वहीं कुछ बड़े चेहरों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी का बाजार गर्म कर दिया है। बैठक में उपमुख्यमंत्री व गृहमंत्री विजय शर्मा, वरिष्ठ विधायक अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, पूर्व केंद्रीय मंत्री व विधायक रेणुका सिंह, रायमुनि भगत, चेतरात अटामी और भैयालाल राजवाड़े उपस्थित नहीं हो पाए।

हालांकि, पार्टी सूत्रों और आधिकारिक स्पष्टीकरण के मुताबिक, इन दिग्गजों की अनुपस्थिति के पीछे कोई राजनीतिक मनमुटाव नहीं बल्कि पूरी तरह से व्यक्तिगत और पूर्व-निर्धारित कारण हैं। गृहमंत्री विजय शर्मा और वरिष्ठ नेता राजेश मूणत अपने पारिवारिक कार्यक्रमों में व्यस्त होने के कारण शामिल नहीं हो सके, जबकि अमर अग्रवाल प्रदेश से बाहर थे। सत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए अनुपस्थित विधायकों और मंत्रियों तक भी बैठक में तय किए गए ‘होमवर्क’ और निर्देशों की कॉपी तुरंत पहुंचा दी गई है ताकि तैयारी में कोई कसर न रहे।

साय सरकार का ‘प्रो-एक्टिव’ मोड - आमतौर पर सरकारें विपक्ष के हमलों का इंतजार करती हैं और फिर सदन में उनका जवाब देती हैं। लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में नजारा बदला हुआ है। साय सरकार ‘रिएक्टिव’ होने के बजाय ‘प्रो-एक्टिव’ मोड में नजर आ रही है। 5 दिनों के इस छोटे सत्र में सरकार न सिर्फ विपक्ष के हर वार को निष्फल करना चाहती है, बल्कि कई महत्वपूर्ण विधेयकों और जनहित के फैसलों को पारित कराकर अपनी प्रशासनिक पकड़ को और मजबूत साबित करना चाहती है।

अब देखना यह होगा कि भाजपा का यह ‘होमवर्क’ सदन की लाइव कार्यवाही के दौरान कितना कारगर साबित होता है और कांग्रेस इस अभेद्य किलेबंदी को भेदने के लिए क्या नया पैंतरा अपनाती है!



khabrilalरायपुर। विष्णुदेव सरकार इन दिनों विपक्ष से खौफ खा रही है, तो छत्तीसगढ़ की राजनीति इस समय पूरी तरह गर्माई हुई है। 13 जुलाई से शुरू होने जा रहा विधानसभा का मानसून सत्र इस बार सिर्फ एक विधायी औपचारिकता भर नहीं होने वाला, बल्कि यह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक हाई-वोल्टेज सियासी दंगल में बदलने जा रहा है। नवा रायपुर में हुई विष्णुदेव साय सरकार की मैराथन बैठक के बाद यह साफ हो चुका है कि इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) रक्षात्मक मुद्रा में रहने के मूड में बिल्कुल नहीं है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री अरुण साव की मौजूदगी में हुई इस बैठक में मंत्रियों और विधायकों को जो ‘स्पेशल होमवर्क’ दिया गया है, उसने यह साफ कर दिया है कि सदन के भीतर इस बार का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है।

सदन में सिर्फ हाजिरी नहीं, आंकड़ों की धमक चाहिए

नवा रायपुर में जब भाजपा विधायक दल की बैठक शुरू हुई, तो एजेंडा सिर्फ सत्र की तारीखें तय करना नहीं था। नेतृत्व की तरफ से सभी विधायकों और मंत्रियों को बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया गया कि सदन में आपकी सिर्फ शारीरिक मौजूदगी काफी नहीं है। इस बार आपको पूरी तैयारी, सटीक आंकड़ों और अपने क्षेत्र की जमीनी हकीकत की फाइलों के साथ उतरना होगा।

पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि विपक्ष इस बार सरकार को घेरने के लिए पूरी ताकत झोंकने की फिराक में है। ऐसे में किसी भी मंत्री या विधायक की एक छोटी सी ढिलाई या अधूरी जानकारी पूरी सरकार को असहज कर सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए हर विधायक को उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ा एक विशेष ‘टास्क’ सौंप दिया गया है।

विधायकों को सख्त निर्देश दिया गया है कि वे अपने क्षेत्र में चल रही विकास योजनाओं, केंद्र और राज्य सरकार की फ्लैगशिप स्कीम्स के क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर जनता को मिल रहे लाभ का पूरा डेटा अपनी जुबान पर रखें। अगर विपक्ष किसी भी क्षेत्र विशेष को लेकर सवाल उठाता है, तो सत्ता पक्ष का विधायक केवल राजनीतिक भाषण नहीं देगा, बल्कि वह आधिकारिक आंकड़ों और तथ्यों के साथ पलटवार करेगा ताकि विपक्ष के आरोपों की हवा निकाली जा सके।

‘नकटी एनक्रोचमेंट’ और ‘बुलडोजर एक्शन’ :

इस मानसून सत्र में जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा तकरार होने की उम्मीद है, वह है रायपुर का ‘नकटी गांव मामला’। नकटी गांव में हाल ही में प्रशासन द्वारा की गई अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई, वहां से लोगों का विस्थापन और विधायक आवास के लिए प्रस्तावित भूमि को लेकर उठा विवाद इस समय छत्तीसगढ़ की राजनीति का सबसे हॉट टॉपिक बना हुआ है।हैरानी की बात यह है कि इस मुद्दे पर केवल विपक्ष ही हमलावर नहीं है, बल्कि भाजपा के ही एक सांसद द्वारा इस कार्रवाई पर सवाल उठाए जाने के बाद से सरकार के भीतर और बाहर का माहौल बेहद संवेदनशील हो गया है। कांग्रेस इस मामले को ‘गरीब विरोधी’ और ‘प्रशासनिक तानाशाही’ का रूप देकर सदन में सरकार की घेराबंदी करने की पूरी तैयारी कर चुकी है।

विधायक दल की बैठक में नकटी मामले पर विशेष रूप से मंथन हुआ। मंत्रियों को स्पष्ट हिदायत दी गई है कि इस मामले में प्रशासनिक नियमों, भू-आवंटन के कानूनी पहलुओं और विस्थापितों के लिए किए गए पुनर्वास के प्रयासों को पूरी पारदर्शिता के साथ सदन के पटल पर रखा जाए। सरकार इस मुद्दे पर बैकफुट पर जाने के बजाय इसे ‘नियम और कानून के राज’ के रूप में पेश करने की रणनीति बना रही है।

इन 5 कोर मुद्दों पर कांग्रेस करेगी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’, भाजपा ने तैयार की ‘शील्ड’ - 13 से 17 जुलाई तक चलने वाले इस 5 दिवसीय संक्षिप्त लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सत्र में कांग्रेस ने सरकार को घेरने के लिए जिन 5 मुख्य मोर्चों को चुना है, सत्ता पक्ष ने उनकी काट पहले से ही तैयार कर ली है।

पहला मोर्चा (कानून-व्यवस्था): प्रदेश की हालिया आपराधिक घटनाओं को लेकर विपक्ष आक्रामक रुख अपनाएगा। इसके जवाब में सरकार पिछले शासनकाल (कांग्रेस राज) के क्राइम ग्राफ के तुलनात्मक आंकड़े पेश कर कांग्रेस को आईना दिखाने की तैयारी में है।

दूसरा मोर्चा (नकटी बुलडोजर कार्रवाई): विस्थापन और प्रशासनिक मनमानी के आरोपों का सामना करने के लिए सरकार नियमों के तहत की गई कार्रवाई और पुनर्वास के ठोस तथ्यों को सामने रखेगी।

तीसरा मोर्चा (किसान और कृषि): खाद-बीज की उपलब्धता और बोनस वितरण के मुद्दों पर विपक्ष के वार को बेकार करने के लिए ‘कृषि उन्नति योजना’ के तहत किसानों के खातों में ट्रांसफर की गई राशि का पूरा ब्यौरा तैयार रखा गया है।

चौथा मोर्चा (आदिवासी क्षेत्रों में विकास): बस्तर और सरगुजा के स्थानीय मुद्दों पर विपक्ष को शांत करने के लिए साय सरकार द्वारा आदिवासी कल्याण के लिए शुरू की गई नई योजनाओं का आक्रामक प्रचार किया जाएगा।

पांचवां मोर्चा (बुनियादी सुविधाएं): सड़क, बिजली और पानी की स्थिति पर उठने वाले सवालों के जवाब में बजट आवंटन और प्रगतिरत परियोजनाओं की वास्तविक ‘स्टेटस रिपोर्ट’ सदन में रखी जाएगी।

‘वन वॉइस’ पॉलिसी : इस बैठक की एक और बेहद महत्वपूर्ण बात जो छनकर सामने आई है, वह है ‘वन वॉइस’ (एक सुर) की नीति। पार्टी नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि सदन के भीतर या बाहर, किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर अलग-अलग मंत्रियों या विधायकों के बयानों में विरोधाभास नहीं दिखना चाहिए।

अक्सर देखा जाता है कि सदन के भीतर विपक्ष के तीखे सवालों के आगे कुछ विधायक भावनाओं में बहकर या अधूरी जानकारी के कारण ऐसा बयान दे देते हैं जिससे पूरी पार्टी और सरकार की किरकिरी हो जाती है। इस बार इसे रोकने के लिए सख्त गाइडलाइंस दी गई हैं। मंत्रियों और उनके विभागों से जुड़े विधायकों के बीच लगातार समन्वय रहेगा। इसके साथ ही, सदन की कार्यवाही के दौरान या बाद में जब भी मीडिया से बातचीत हो, तो केवल आधिकारिक तौर पर तय की गई ‘लाइन’ पर ही बात की जाए। बिना तथ्यों के किसी भी विषय पर कयास लगाने वाले बयानों से बचने को कहा गया है।

बैठक से दिग्गजों की दूरी - इस हाई-प्रोफाइल बैठक में जहां एक तरफ पूरी सरकार और संगठन सत्र को सफल बनाने के लिए सिर जोड़कर बैठा था, वहीं कुछ बड़े चेहरों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी का बाजार गर्म कर दिया है। बैठक में उपमुख्यमंत्री व गृहमंत्री विजय शर्मा, वरिष्ठ विधायक अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, पूर्व केंद्रीय मंत्री व विधायक रेणुका सिंह, रायमुनि भगत, चेतरात अटामी और भैयालाल राजवाड़े उपस्थित नहीं हो पाए।

हालांकि, पार्टी सूत्रों और आधिकारिक स्पष्टीकरण के मुताबिक, इन दिग्गजों की अनुपस्थिति के पीछे कोई राजनीतिक मनमुटाव नहीं बल्कि पूरी तरह से व्यक्तिगत और पूर्व-निर्धारित कारण हैं। गृहमंत्री विजय शर्मा और वरिष्ठ नेता राजेश मूणत अपने पारिवारिक कार्यक्रमों में व्यस्त होने के कारण शामिल नहीं हो सके, जबकि अमर अग्रवाल प्रदेश से बाहर थे। सत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए अनुपस्थित विधायकों और मंत्रियों तक भी बैठक में तय किए गए ‘होमवर्क’ और निर्देशों की कॉपी तुरंत पहुंचा दी गई है ताकि तैयारी में कोई कसर न रहे।

साय सरकार का ‘प्रो-एक्टिव’ मोड - आमतौर पर सरकारें विपक्ष के हमलों का इंतजार करती हैं और फिर सदन में उनका जवाब देती हैं। लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में नजारा बदला हुआ है। साय सरकार ‘रिएक्टिव’ होने के बजाय ‘प्रो-एक्टिव’ मोड में नजर आ रही है। 5 दिनों के इस छोटे सत्र में सरकार न सिर्फ विपक्ष के हर वार को निष्फल करना चाहती है, बल्कि कई महत्वपूर्ण विधेयकों और जनहित के फैसलों को पारित कराकर अपनी प्रशासनिक पकड़ को और मजबूत साबित करना चाहती है।

अब देखना यह होगा कि भाजपा का यह ‘होमवर्क’ सदन की लाइव कार्यवाही के दौरान कितना कारगर साबित होता है और कांग्रेस इस अभेद्य किलेबंदी को भेदने के लिए क्या नया पैंतरा अपनाती है!


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