नई दिल्लीः डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने भारत में अवीक्ली नाम की नई इंसुलिन लॉन्च की है। कंपनी का दावा है कि यह हफ्ते में एक बार दिए जाने वाला बेसल इंसुलिन है, जो टाइप- 1 और टाइप-2 डायबिटीज के वयस्क मरीजों के लिए है। भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि 13.6 करोड़ लोगों को प्री- डायबिटीज है। फिलहाल देश में करीब 60 लाख लोग इंसुलिन थेरेपी ले रहे हैं।
एम्स के मेडिसिन डिपार्टमेंट के प्रोफेसर नीरज निश्चल ने कहा कि हफ्ते में एक बार लगने वाली लॉन्ग-एक्टिंग इंसुलिन दुनिया के कुछ देशों में पहले से इस्तेमाल हो रही है। नई साप्ताहिक लॉन्ग-एक्टिंग इंसुलिन आने से रोज लगने वाले बेसल इंसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत कम हो जाएगी। हालांकि, भोजन के बाद लगने वाली शॉर्ट एक्टिंग इंसुलिन की जरूरत कई मरीजों में पहले की तरह बनी रह सकती है।
प्रो. निश्चल ने कहा कि इस तरह की नई इंसुलिन की शुरुआत के दौरान सही डोज तय करने में कुछ समय लग सकता है। इस दौरान हाइपोग्लाइसीमिया ( ब्लड शुगर बहुत कम होने) का खतरा भी रह सकता है। एम्स दिल्ली के प्रोफेसर नवल विक्रम ने कहा कि हफ्ते में एक बार लगने वाली बेसल इंसुलिन पर कई देशों में अध्ययन हुए हैं और उनमें इसके अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं।
डॉक्टर की सलाह जरूर लें - एम्स के प्रोफेसर ने कहा है कि हर ब्रांड की इंसुलिन की प्रभावशीलता और उसके क्लीनिकल परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी भी नई साप्ताहिक इंसुलिन पर जाने का फैसला मरीज को अपने डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए। रोज लगने वाली इंसुलिन से साप्ताहिक इंसुलिन पर शिफ्ट करते समय डोज का सही निर्धारण और समय-समय पर उसका एडजस्टमेंट करना पड़ता है।
नई दिल्लीः डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने भारत में अवीक्ली नाम की नई इंसुलिन लॉन्च की है। कंपनी का दावा है कि यह हफ्ते में एक बार दिए जाने वाला बेसल इंसुलिन है, जो टाइप- 1 और टाइप-2 डायबिटीज के वयस्क मरीजों के लिए है। भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि 13.6 करोड़ लोगों को प्री- डायबिटीज है। फिलहाल देश में करीब 60 लाख लोग इंसुलिन थेरेपी ले रहे हैं।
एम्स के मेडिसिन डिपार्टमेंट के प्रोफेसर नीरज निश्चल ने कहा कि हफ्ते में एक बार लगने वाली लॉन्ग-एक्टिंग इंसुलिन दुनिया के कुछ देशों में पहले से इस्तेमाल हो रही है। नई साप्ताहिक लॉन्ग-एक्टिंग इंसुलिन आने से रोज लगने वाले बेसल इंसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत कम हो जाएगी। हालांकि, भोजन के बाद लगने वाली शॉर्ट एक्टिंग इंसुलिन की जरूरत कई मरीजों में पहले की तरह बनी रह सकती है।
प्रो. निश्चल ने कहा कि इस तरह की नई इंसुलिन की शुरुआत के दौरान सही डोज तय करने में कुछ समय लग सकता है। इस दौरान हाइपोग्लाइसीमिया ( ब्लड शुगर बहुत कम होने) का खतरा भी रह सकता है। एम्स दिल्ली के प्रोफेसर नवल विक्रम ने कहा कि हफ्ते में एक बार लगने वाली बेसल इंसुलिन पर कई देशों में अध्ययन हुए हैं और उनमें इसके अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं।
डॉक्टर की सलाह जरूर लें - एम्स के प्रोफेसर ने कहा है कि हर ब्रांड की इंसुलिन की प्रभावशीलता और उसके क्लीनिकल परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी भी नई साप्ताहिक इंसुलिन पर जाने का फैसला मरीज को अपने डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए। रोज लगने वाली इंसुलिन से साप्ताहिक इंसुलिन पर शिफ्ट करते समय डोज का सही निर्धारण और समय-समय पर उसका एडजस्टमेंट करना पड़ता है।


Journalist खबरीलाल














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