
नेपाल में ग्लेशियर ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालय की संवेदनशीलता के साथ चीन के निर्माणाधीन मेदोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। करीब 60,000 मेगावाट क्षमता वाली यह परियोजना तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाई जा रही है। यही नदी भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग और फिर ब्रह्मपुत्र कहलाती है।
शुरुआत में नेपाल की आपदा को भूकंप से जोड़कर देखा गया था, लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के विश्लेषण के मुताबिक ग्लेशियर के ढहने और मलबे के तेज बहाव ने इस तबाही को जन्म दिया। घटना ने हिमालय जैसे भूकंपीय और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में विशाल बांध की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मेदोग परियोजना पूरी होने के बाद दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल हो सकती है। इसका निर्माण ऐसे क्षेत्र में हो रहा है जहां भूकंप, भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा बना रहता है। विशेषज्ञों को आशंका है कि किसी बड़े प्राकृतिक हादसे या जलप्रवाह में अचानक बदलाव का असर भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम तक पड़ सकता है।
भारत की चिंता सिर्फ संभावित बांध दुर्घटना तक सीमित नहीं है। चीन नदी के ऊपरी हिस्से को नियंत्रित करता है और भारत के पास चीन के साथ व्यापक जल-साझेदारी समझौता नहीं है। ऐसे में वास्तविक समय में जल प्रवाह की जानकारी साझा करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारत ने इसके जवाब में 11,000 मेगावाट की अपर सियांग परियोजना को आगे बढ़ाया है। हालांकि इसे लेकर स्थानीय स्तर पर पर्यावरण और विस्थापन से जुड़े सवाल भी हैं।
नेपाल की त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालय में ग्लेशियर टूटना, भूस्खलन और अचानक बाढ़ भविष्य में बड़ी चुनौतियां बन सकते हैं। इसलिए मेदोग परियोजना अब केवल चीन की ऊर्जा योजना नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन गई है।

नेपाल में ग्लेशियर ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालय की संवेदनशीलता के साथ चीन के निर्माणाधीन मेदोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। करीब 60,000 मेगावाट क्षमता वाली यह परियोजना तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाई जा रही है। यही नदी भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग और फिर ब्रह्मपुत्र कहलाती है।
शुरुआत में नेपाल की आपदा को भूकंप से जोड़कर देखा गया था, लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के विश्लेषण के मुताबिक ग्लेशियर के ढहने और मलबे के तेज बहाव ने इस तबाही को जन्म दिया। घटना ने हिमालय जैसे भूकंपीय और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में विशाल बांध की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मेदोग परियोजना पूरी होने के बाद दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल हो सकती है। इसका निर्माण ऐसे क्षेत्र में हो रहा है जहां भूकंप, भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा बना रहता है। विशेषज्ञों को आशंका है कि किसी बड़े प्राकृतिक हादसे या जलप्रवाह में अचानक बदलाव का असर भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम तक पड़ सकता है।
भारत की चिंता सिर्फ संभावित बांध दुर्घटना तक सीमित नहीं है। चीन नदी के ऊपरी हिस्से को नियंत्रित करता है और भारत के पास चीन के साथ व्यापक जल-साझेदारी समझौता नहीं है। ऐसे में वास्तविक समय में जल प्रवाह की जानकारी साझा करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारत ने इसके जवाब में 11,000 मेगावाट की अपर सियांग परियोजना को आगे बढ़ाया है। हालांकि इसे लेकर स्थानीय स्तर पर पर्यावरण और विस्थापन से जुड़े सवाल भी हैं।
नेपाल की त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालय में ग्लेशियर टूटना, भूस्खलन और अचानक बाढ़ भविष्य में बड़ी चुनौतियां बन सकते हैं। इसलिए मेदोग परियोजना अब केवल चीन की ऊर्जा योजना नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन गई है।


Journalist खबरीलाल















