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Raipur (खबरीलाल न्यूज़) :: सुप्रीम कोर्ट ने अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया :

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नयी दिल्ली/रायपुर 20 अप्रैल 2026। बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में एक बार फिर कानूनी हलचल तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया है। साथ ही कोर्ट ने इस मामले से जुड़े दो अहम मामलों की संयुक्त सुनवाई 23 अप्रैल को तय की है।

दरअसल, अमित जोगी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी गई थी। पहला आदेश वह था जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को अपील करने की अनुमति दी गई थी। दूसरा, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का वह फैसला था, जिसमें अमित जोगी को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों मामलों को एक साथ सुनने का निर्णय लिया है, जिससे पूरे प्रकरण की व्यापक समीक्षा हो सके।

इस मामले की जड़ें 4 जून 2003 की उस घटना से जुड़ी हैं, जब रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस सनसनीखेज हत्याकांड ने उस समय पूरे प्रदेश में राजनीतिक भूचाल ला दिया था। जांच के दौरान कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह सरकारी गवाह बन गए थे। बाद में 28 आरोपियों को सजा सुनाई गई, जबकि अमित जोगी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।

31 मई 2007 को विशेष सीबीआई अदालत रायपुर ने पर्याप्त साक्ष्य न होने के आधार पर अमित जोगी को दोषमुक्त कर दिया था। इस फैसले को रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने अमित जोगी के पक्ष में राहत देते हुए मामले को आगे की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेज दिया था।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सतीश जग्गी की ओर से उनके वकील बीपी शर्मा ने गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने तर्क दिया था कि यह हत्या तत्कालीन राज्य सरकार की “प्रायोजित साजिश” का हिस्सा थी। उनके अनुसार, जब सीबीआई ने जांच शुरू की, तब कथित तौर पर प्रभाव का इस्तेमाल कर सबूतों को नष्ट कर दिया गया था। ऐसे में उन्होंने अदालत से आग्रह किया था कि इस मामले में केवल प्रत्यक्ष सबूतों के अभाव को आधार बनाकर आरोपियों को बरी नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि पूरे षड्यंत्र को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए।

अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोनों मामलों की संयुक्त सुनवाई तय किए जाने के बाद इस हाई-प्रोफाइल केस पर एक बार फिर सबकी नजरें टिक गई हैं। 23 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में यह साफ हो सकता है कि अमित जोगी को राहत मिलती है या फिर हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाता है।


नयी दिल्ली/रायपुर 20 अप्रैल 2026। बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में एक बार फिर कानूनी हलचल तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया है। साथ ही कोर्ट ने इस मामले से जुड़े दो अहम मामलों की संयुक्त सुनवाई 23 अप्रैल को तय की है।

दरअसल, अमित जोगी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग आदेशों को चुनौती दी गई थी। पहला आदेश वह था जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को अपील करने की अनुमति दी गई थी। दूसरा, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का वह फैसला था, जिसमें अमित जोगी को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों मामलों को एक साथ सुनने का निर्णय लिया है, जिससे पूरे प्रकरण की व्यापक समीक्षा हो सके।

इस मामले की जड़ें 4 जून 2003 की उस घटना से जुड़ी हैं, जब रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस सनसनीखेज हत्याकांड ने उस समय पूरे प्रदेश में राजनीतिक भूचाल ला दिया था। जांच के दौरान कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह सरकारी गवाह बन गए थे। बाद में 28 आरोपियों को सजा सुनाई गई, जबकि अमित जोगी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।

31 मई 2007 को विशेष सीबीआई अदालत रायपुर ने पर्याप्त साक्ष्य न होने के आधार पर अमित जोगी को दोषमुक्त कर दिया था। इस फैसले को रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने अमित जोगी के पक्ष में राहत देते हुए मामले को आगे की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेज दिया था।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सतीश जग्गी की ओर से उनके वकील बीपी शर्मा ने गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने तर्क दिया था कि यह हत्या तत्कालीन राज्य सरकार की “प्रायोजित साजिश” का हिस्सा थी। उनके अनुसार, जब सीबीआई ने जांच शुरू की, तब कथित तौर पर प्रभाव का इस्तेमाल कर सबूतों को नष्ट कर दिया गया था। ऐसे में उन्होंने अदालत से आग्रह किया था कि इस मामले में केवल प्रत्यक्ष सबूतों के अभाव को आधार बनाकर आरोपियों को बरी नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि पूरे षड्यंत्र को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए।

अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोनों मामलों की संयुक्त सुनवाई तय किए जाने के बाद इस हाई-प्रोफाइल केस पर एक बार फिर सबकी नजरें टिक गई हैं। 23 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में यह साफ हो सकता है कि अमित जोगी को राहत मिलती है या फिर हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाता है।


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