जगदलपुर/ बीजापुर। वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ के वनांचलों में विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है। बीजापुर वनमंडल के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में कैम्पा मद से निर्मित वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर (WHS) अब ग्रामीणों की आर्थिक उन्नति, रोजगार सृजन और पोषण सुरक्षा का मजबूत माध्यम बनकर उभरे हैं। विशेष रूप से भैरमगढ़ परिक्षेत्र के पोन्दुम, हलूर, कोतरापाल और करेंमरका गांवों में इन जल संरचनाओं ने ग्रामीण जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। वन मंत्री केदार कश्यप की सोच रही है कि वन संरक्षण के साथ-साथ वनांचल में रहने वाले परिवारों की आजीविका भी मजबूत हो। इसी उद्देश्य से निर्मित तालाबों में मछली पालन को बढ़ावा दिया गया, जिसका परिणाम अब सामने आने लगा है।
भैरमगढ़ परिक्षेत्र के ग्राम पोन्दुम में कैम्पा मद से लगभग 5 एकड़ क्षेत्र में वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर का निर्माण किया गया था। वन प्रबंध समिति और ग्रामीणों के सहयोग से इसमें 70 किलोग्राम मछली बीज डाला गया था। 30 मई 2026 को तालाब से मछली निकासी का कार्य प्रारंभ किया गया, जिसमें पहले ही दिन लगभग 150 क्विंटल मछली प्राप्त हुई। कई मछलियों का वजन 4 से 5 किलोग्राम तक पाया गया। अनुमान है कि इस तालाब से ग्रामीणों को 5 लाख रुपये से अधिक की आय प्राप्त होगी। यह सफलता वन विभाग और स्थानीय समुदाय की साझेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण बन गई है।
वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देशन में वर्ष 2023-24 के दौरान ग्राम हलूर, कोतरापाल और करेंमरका में भी कैम्पा मद से तालाबों का निर्माण कराया गया। इन जल संरचनाओं में वन प्रबंध समितियों द्वारा मछली बीज डाला गया है और आगामी समय में इनसे भी बड़े पैमाने पर मछली उत्पादन की संभावना है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार इन गांवों के ग्रामीणों को भी आने वाले समय में 5 से 6 लाख रुपये तक की अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।
इन तालाबों ने केवल मछली पालन तक ही अपनी उपयोगिता सीमित नहीं रखी है, बल्कि ग्रामीण विकास के कई आयामों को मजबूत किया है—
1. भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
2. किसानों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध हो रहा है।
3. ग्रामीण परिवारों को स्थानीय स्तर पर पौष्टिक आहार के रूप में ताजी मछलियां मिल रही हैं।
4. स्थानीय बाजारों में मछली की उपलब्धता बढ़ी है।
5. रोजगार और आय के नए अवसर सृजित हुए हैं।
वन मंत्री केदार कश्यप की पहल से बीजापुर के वनांचलों में जल संरक्षण, आजीविका संवर्धन और सामुदायिक सहभागिता का एक सफल मॉडल विकसित हुआ है। यह पहल साबित कर रही है कि प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ग्रामीण विकास की दिशा में बड़े परिवर्तन ला सकती है। आज पोन्दुम, हलूर, कोतरापाल और करेंमरका जैसे गांव केवल मछली उत्पादन के केंद्र नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और समृद्ध वनांचल के प्रेरक उदाहरण बनकर उभर रहे हैं। वन विभाग की इस सफलता से प्रेरित होकर अब क्षेत्र के अन्य गांव भी अपने यहां ऐसे तालाबों के निर्माण की मांग कर रहे हैं, जिससे विकास का यह मॉडल और व्यापक रूप से फैल सके।
जगदलपुर/ बीजापुर। वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ के वनांचलों में विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है। बीजापुर वनमंडल के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में कैम्पा मद से निर्मित वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर (WHS) अब ग्रामीणों की आर्थिक उन्नति, रोजगार सृजन और पोषण सुरक्षा का मजबूत माध्यम बनकर उभरे हैं। विशेष रूप से भैरमगढ़ परिक्षेत्र के पोन्दुम, हलूर, कोतरापाल और करेंमरका गांवों में इन जल संरचनाओं ने ग्रामीण जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। वन मंत्री केदार कश्यप की सोच रही है कि वन संरक्षण के साथ-साथ वनांचल में रहने वाले परिवारों की आजीविका भी मजबूत हो। इसी उद्देश्य से निर्मित तालाबों में मछली पालन को बढ़ावा दिया गया, जिसका परिणाम अब सामने आने लगा है।
भैरमगढ़ परिक्षेत्र के ग्राम पोन्दुम में कैम्पा मद से लगभग 5 एकड़ क्षेत्र में वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर का निर्माण किया गया था। वन प्रबंध समिति और ग्रामीणों के सहयोग से इसमें 70 किलोग्राम मछली बीज डाला गया था। 30 मई 2026 को तालाब से मछली निकासी का कार्य प्रारंभ किया गया, जिसमें पहले ही दिन लगभग 150 क्विंटल मछली प्राप्त हुई। कई मछलियों का वजन 4 से 5 किलोग्राम तक पाया गया। अनुमान है कि इस तालाब से ग्रामीणों को 5 लाख रुपये से अधिक की आय प्राप्त होगी। यह सफलता वन विभाग और स्थानीय समुदाय की साझेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण बन गई है।
वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देशन में वर्ष 2023-24 के दौरान ग्राम हलूर, कोतरापाल और करेंमरका में भी कैम्पा मद से तालाबों का निर्माण कराया गया। इन जल संरचनाओं में वन प्रबंध समितियों द्वारा मछली बीज डाला गया है और आगामी समय में इनसे भी बड़े पैमाने पर मछली उत्पादन की संभावना है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार इन गांवों के ग्रामीणों को भी आने वाले समय में 5 से 6 लाख रुपये तक की अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।
इन तालाबों ने केवल मछली पालन तक ही अपनी उपयोगिता सीमित नहीं रखी है, बल्कि ग्रामीण विकास के कई आयामों को मजबूत किया है—
1. भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
2. किसानों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध हो रहा है।
3. ग्रामीण परिवारों को स्थानीय स्तर पर पौष्टिक आहार के रूप में ताजी मछलियां मिल रही हैं।
4. स्थानीय बाजारों में मछली की उपलब्धता बढ़ी है।
5. रोजगार और आय के नए अवसर सृजित हुए हैं।
वन मंत्री केदार कश्यप की पहल से बीजापुर के वनांचलों में जल संरक्षण, आजीविका संवर्धन और सामुदायिक सहभागिता का एक सफल मॉडल विकसित हुआ है। यह पहल साबित कर रही है कि प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ग्रामीण विकास की दिशा में बड़े परिवर्तन ला सकती है। आज पोन्दुम, हलूर, कोतरापाल और करेंमरका जैसे गांव केवल मछली उत्पादन के केंद्र नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और समृद्ध वनांचल के प्रेरक उदाहरण बनकर उभर रहे हैं। वन विभाग की इस सफलता से प्रेरित होकर अब क्षेत्र के अन्य गांव भी अपने यहां ऐसे तालाबों के निर्माण की मांग कर रहे हैं, जिससे विकास का यह मॉडल और व्यापक रूप से फैल सके।



Journalist खबरीलाल














