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छत्तीसगढ post authorJournalist खबरीलाल LAST UPDATED ON:Wednesday ,April 15,2026

Raipur (खबरीलाल न्यूज़) :: वेदांता ने नहीं लिया सबक, 16 साल बाद फिर दिया दर्द !!!:

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रायपुर, 15 अप्रैल 2026। 14 अप्रैल 2026 को जब देश में भारतीय संविधान के नायक बाबा साहेब अंबेडकर की जयंती मना रहा था उस वक्त छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता के सिंहितराई प्लांट में श्रमिक काम में जुटे थे। दोपहर 2 बजे बायलर फट जाने से उसकी चपेट में आये 16 श्रमिकों की दर्दनाक मौत हो गयी। 30 से अधिक श्रमिक जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। 16 साल पहले वेंदाता समूह के ही कोरबा स्थित बालको संयंत्र में चिमनी गिरने से 40 श्रमिकों की मौत हुई थी। वेंदाता समूह ने शायद उस घटना से सबक लिया होता तो शायद दुबारा ये दर्दनाक हादसा सिंहितराई प्लांट में न होता।

फिलहाल वेदांता समूह ने हताहत श्रमिका के परिजनों को 35-35 लाख रुपये और घायलों को 15-15 लाख रुपये का मुआवजा देने और परिवार के एक-एक सदस्यों को स्थायी नौकरी देने की घोषणा किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी घटना को संज्ञान में लिया है और हताहत श्रमिकों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये दिये जाने की घोषणा की है। उधर राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी हताहत श्रमिकों के परिवारजनों को 5-5 लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये दिये जाने की घोषणा किया है।

मुख्यमंत्र श्री साय ने सभी घायलों के समुचित एवं निःशुल्क उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। कमिश्नर बिलासपुर को घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। जो भी दोषी पाए जाएंगे, उनके विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार पूरे मामले पर सतत निगरानी रखे हुए है और प्रभावित परिवारों के साथ पूरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ खड़ी है।

घटना के बाद सरकार और समूह प्रबंधन ने जो कुछ किया या फिर कर रहे हैं वह उनकी जिम्मेदारी भी है और संवेदनशीलता भी। वेदांता के पावर प्लांट का विशालकाय बॉयलर फटने से गर्म भाप, लोहे के टुकड़े और आग के गोलों ने वहां मौजूद श्रमिकों को संभलने का मौका तक नहीं दिया। हर बड़े हादसे के बाद जांच कमेटियां बैठती हैं, सुरक्षा ऑडिट की बड़ी-बड़ी बातें कही जाती है। सक्ती की इस घटना ने बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं।

1) क्या बॉयलर का नियमित रखरखाव किया जा रहा था।

2) संयंत्र में दबाव मापने वाले यंत्र सही तरीके से काम कर रहे थे।

3) उस समय वहां मौजूद मजदूरों को आपातकालीन स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण दिया गया था।

2009 के बालको कांड में अभी भी न्याय की प्रतीक्षा - छत्तीसगढ़ वर्ष 2009 में भी ऐसे ही हादसे का दर्दनाक दंश झेल चुका है। सितंबर 2009 में कोरबा स्थित बालको संयंत्र में निर्माणाधीन 110 मीटर ऊंची चिमनी ढह गई थी। उस मलबे में दबकर 40 से अधिक मजदूरों ने दम तोड़ दिया था।

घटना की जांच हुई। जांच में निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग किया गया पाया गया था। सेपको (SEPCO) और GDCL जैसी बड़ी कंपनियों को आरोपी बनाया गया। लेकिन न्याय की गति इतनी धीमी रही कि 16 वर्ष बाद भी दोषियों को सजा नहीं मिल सकी है। सेपको के इंजीनियर, जिन पर गैर-इरादतन हत्या का मामला था, देश छोड़कर भाग गए और कभी वापस नहीं आए। वर्ष 2025 में कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए अधिकारियों को आरोपी तो बनाया, लेकिन सजा का प्रावधान अब भी फाइलों में बंद है।

औद्योगिक सुरक्षा विभाग का निगरानी तंत्र पंगु - जब तक औद्योगिक हादसों को ‘दुर्घटना’ के बजाय ‘लापरवाही से किया गया अपराध’ नहीं माना जाएगा, तब तक स्थितियां नहीं बदलेंगी। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र कोरबा, रायगढ़, सक्ती और जांजगीर-चांपा में फैक्ट्रियां तो बढ़ रही हैं, लेकिन श्रम विभाग और औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग का निगरानी तंत्र पंगु नजर आता है।

विदेशी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अक्सर स्थानीय नियमों को ताक पर रख देती हैं। जब हादसा होता है, तो दोष सब-कॉन्ट्रैक्टर पर मढ़ दिया जाता है और मुख्य प्रबंधन साफ बच निकलता है। बालको से लेकर वेदांता तक, यह पैटर्न डराने वाला है।

मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जांच के आदेश दे दिए हैं। लेकिन जनता अब केवल जांच से संतुष्ट नहीं है। यह समय केवल शोक संवेदनाएं व्यक्त करने का नहीं, बल्कि कड़े फैसले लेने का है। यह सवाल आज हर उस श्रमिक की आंखों में है जो कल फिर से किसी कारखाने की दहलीज पर कदम रखेगा। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि सक्ती का यह दर्द आखिरी हो। इस हादसे में न्याय की मिसाल ऐसी बने कि भविष्य में कोई भी कंपनी सुरक्षा मानकों से खिलवाड़ करने की जुर्रत न कर सके।



रायपुर, 15 अप्रैल 2026। 14 अप्रैल 2026 को जब देश में भारतीय संविधान के नायक बाबा साहेब अंबेडकर की जयंती मना रहा था उस वक्त छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता के सिंहितराई प्लांट में श्रमिक काम में जुटे थे। दोपहर 2 बजे बायलर फट जाने से उसकी चपेट में आये 16 श्रमिकों की दर्दनाक मौत हो गयी। 30 से अधिक श्रमिक जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। 16 साल पहले वेंदाता समूह के ही कोरबा स्थित बालको संयंत्र में चिमनी गिरने से 40 श्रमिकों की मौत हुई थी। वेंदाता समूह ने शायद उस घटना से सबक लिया होता तो शायद दुबारा ये दर्दनाक हादसा सिंहितराई प्लांट में न होता।

फिलहाल वेदांता समूह ने हताहत श्रमिका के परिजनों को 35-35 लाख रुपये और घायलों को 15-15 लाख रुपये का मुआवजा देने और परिवार के एक-एक सदस्यों को स्थायी नौकरी देने की घोषणा किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी घटना को संज्ञान में लिया है और हताहत श्रमिकों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये दिये जाने की घोषणा की है। उधर राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी हताहत श्रमिकों के परिवारजनों को 5-5 लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये दिये जाने की घोषणा किया है।

मुख्यमंत्र श्री साय ने सभी घायलों के समुचित एवं निःशुल्क उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। कमिश्नर बिलासपुर को घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। जो भी दोषी पाए जाएंगे, उनके विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार पूरे मामले पर सतत निगरानी रखे हुए है और प्रभावित परिवारों के साथ पूरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ खड़ी है।

घटना के बाद सरकार और समूह प्रबंधन ने जो कुछ किया या फिर कर रहे हैं वह उनकी जिम्मेदारी भी है और संवेदनशीलता भी। वेदांता के पावर प्लांट का विशालकाय बॉयलर फटने से गर्म भाप, लोहे के टुकड़े और आग के गोलों ने वहां मौजूद श्रमिकों को संभलने का मौका तक नहीं दिया। हर बड़े हादसे के बाद जांच कमेटियां बैठती हैं, सुरक्षा ऑडिट की बड़ी-बड़ी बातें कही जाती है। सक्ती की इस घटना ने बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं।

1) क्या बॉयलर का नियमित रखरखाव किया जा रहा था।

2) संयंत्र में दबाव मापने वाले यंत्र सही तरीके से काम कर रहे थे।

3) उस समय वहां मौजूद मजदूरों को आपातकालीन स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण दिया गया था।

2009 के बालको कांड में अभी भी न्याय की प्रतीक्षा - छत्तीसगढ़ वर्ष 2009 में भी ऐसे ही हादसे का दर्दनाक दंश झेल चुका है। सितंबर 2009 में कोरबा स्थित बालको संयंत्र में निर्माणाधीन 110 मीटर ऊंची चिमनी ढह गई थी। उस मलबे में दबकर 40 से अधिक मजदूरों ने दम तोड़ दिया था।

घटना की जांच हुई। जांच में निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग किया गया पाया गया था। सेपको (SEPCO) और GDCL जैसी बड़ी कंपनियों को आरोपी बनाया गया। लेकिन न्याय की गति इतनी धीमी रही कि 16 वर्ष बाद भी दोषियों को सजा नहीं मिल सकी है। सेपको के इंजीनियर, जिन पर गैर-इरादतन हत्या का मामला था, देश छोड़कर भाग गए और कभी वापस नहीं आए। वर्ष 2025 में कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए अधिकारियों को आरोपी तो बनाया, लेकिन सजा का प्रावधान अब भी फाइलों में बंद है।

औद्योगिक सुरक्षा विभाग का निगरानी तंत्र पंगु - जब तक औद्योगिक हादसों को ‘दुर्घटना’ के बजाय ‘लापरवाही से किया गया अपराध’ नहीं माना जाएगा, तब तक स्थितियां नहीं बदलेंगी। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र कोरबा, रायगढ़, सक्ती और जांजगीर-चांपा में फैक्ट्रियां तो बढ़ रही हैं, लेकिन श्रम विभाग और औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा विभाग का निगरानी तंत्र पंगु नजर आता है।

विदेशी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अक्सर स्थानीय नियमों को ताक पर रख देती हैं। जब हादसा होता है, तो दोष सब-कॉन्ट्रैक्टर पर मढ़ दिया जाता है और मुख्य प्रबंधन साफ बच निकलता है। बालको से लेकर वेदांता तक, यह पैटर्न डराने वाला है।

मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जांच के आदेश दे दिए हैं। लेकिन जनता अब केवल जांच से संतुष्ट नहीं है। यह समय केवल शोक संवेदनाएं व्यक्त करने का नहीं, बल्कि कड़े फैसले लेने का है। यह सवाल आज हर उस श्रमिक की आंखों में है जो कल फिर से किसी कारखाने की दहलीज पर कदम रखेगा। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि सक्ती का यह दर्द आखिरी हो। इस हादसे में न्याय की मिसाल ऐसी बने कि भविष्य में कोई भी कंपनी सुरक्षा मानकों से खिलवाड़ करने की जुर्रत न कर सके।



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